एक दोपहर सद्गुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों पर चले गए और एक चट्टान पर बैठ गए। जब उनकी आंखें खुली थीं अचानक, वह शरीर के अनुभव से बाहर निकल गए उन्हें लगा कि वह अब अपने शरीर में नहीं हैं, बल्कि हर जगह फैल गए हैं, चट्टानों में, पेड़ों में, पृथ्वी पर।आगे की स्लाइड में पढ़ें, सद्गुरु जग्गी वासुदेव के बारे में
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सदगुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों में रहस्यमय भावनाएं
चामुंडी पहाड़ियों पर ऐसे ही तमाम ‘रहस्यमय एहसास’ के बाद सद्गुरु जग्गी वासुदेव की सोच पर्यावरण से सीधा जुड़ चुकी थी। जग्गी वासुदेव का जन्म 1957 में कर्नाटक राज्य के मैसूर शहर में हुआ था। उनके पिता डॉक्टर थे। बचपन से ही जग्गी वासुदेव को पर्यावरण से लगाव था। बचपन से ही, वासुदेव दूसरों की तुलना में काफी अलग थे।
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सदगुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों में रहस्यमय भावनाएं
तेरह साल की उम्र में, उन्होंने श्रीराघवेंद्र राव (मल्लदिहल्ली स्वामी) के मार्गदर्शन में प्राणायाम और आसन जैसे योग प्रथा शुरू की थी। उन्होंने कर्नाटक के मैसूर विश्वविद्यालय से स्नातक किया। जब वासुदेव पच्चीस वर्ष के थे, तो उन्होंने एक असामान्य घटना देखी जो उन्हें जीवन और भौतिक वस्तुओं दूर ले गया और त्याग की ओर ले गया।
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सदगुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों में रहस्यमय भावनाएं
गंगा के साथ सेल्फी ली
सदगुरु जग्गी वासुदेव ने कानपुर से लखनऊ जाते समय कानपुर के गंगा बैराज से गंगा के साथ सेल्फी ली। इसके साथ उन्होंने लिखा कि ग्लोरियस गंगा.... लेकिन ज्यादा ग्लोरियस साइट नहीं है।
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सदगुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों में रहस्यमय भावनाएं
कानपुर में सदगुरु जग्गी वासुदेव से मिलने के बाद लोगों के विचार
नदियों का संरक्षण करने और प्रकृति को बचाने की जरूरत है। इसके लिए हम सभी को जागरूक होना पड़ेगा। सदगुरु जग्गी वासुदेव जी ने इस ओर क्रांतिकारी कदम बढ़ाया है इसलिए पीएसआईटी के सभी छात्र-छात्राएं, शिक्षक, कर्मचारी और प्रशासनिक अधिकारी सभी उनके साथ मिलकर उनके इस मुहिम को आगे बढ़ाएंगे।
प्रणवीर सिंह, अध्यक्ष, पीएसआईटी, कानपुर
नदी और पर्यावरण को बचाने के लिए संस्थान का इको क्लब भी काम कर रहा है। हम अपने इस अभियान को जग्गी वासुदेव के अभियान के साथ जोड़कर आगे बढ़ाएंगे।
शेफाली राज, प्रबंध निदेशक, पीएसआईटी, कानपुर
हम सभी को यह मालूम है कि नदी हमारे घर तक नहीं चलकर आएगी बल्कि हमें नदियों तक पहुंचना होगा। इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए कि हम अपनी नदियों को बचाने के लिए कदम उठाएं।
डॉ. गरिमा विलियम्स, शिक्षिक, पीएसआईटी
नदियों के लिए जागरुकता अभियान चलाना सराहनीय है। जग्गी वासुदेव ने कई ऐसी जानकारी दीं जो चौंकाने वाली हैं। हम उनके इस अभियान में उनके साथ हैं।
सदगुरु जग्गी वासुदेव चामुंडी पहाड़ियों में रहस्यमय भावनाएं
रोहित आहूजा, छात्र
बहुत सी नदियां पूरे साल बहती थीं लेकिन अब वह केवल बारिश के दौरान ही बहती हैं। ऐसा हम सभी की लापरवाही से हुआ है। इसे हमें ही सुधारना होगा।
अनुग्रह, छात्र
नदियों को पुराने स्वरूप में लाने के लिए हमें अपने घर से शुरूआत करनी होगी। घर घर पानी बचाना होगा। नदियों में गंदगी को रोकना होगा।
मानवी पांडेय, छात्रा
युवा पीढ़ी हर चीज जल्दी हासिल करना चाहती है। यही कारण है कि विकास के नाम पर पर्यावरण को काफी क्षति पहुंचाई गई है। इसका खामियाजा हमें भुगतना होगा।
अस्मित यादव, छात्र
यह हम युवाओं के लिए चिंताजनक है कि आने वाले दिनों में नदियां समाप्त हो जाएंगी। इसे रोकने के लिए हम सबको आगे आना होगा।
उत्कर्ष वर्मा, छात्र