संवाद न्यूज एजेंसी ने बेतवा तट स्थित मंदिरों, पक्का घाट, जंगल में स्थित प्राचीन महलों और आसपास के ऐतिहासिक स्थलों की पड़ताल की। कई स्थानों पर उखड़ा हुआ फर्श, क्षतिग्रस्त पत्थर और गड्ढे दिखाई दिए। जंगल के भीतर स्थित तीन से चार मंजिला महल के कई कमरों में भी खोदाई के निशान मिले। स्थानीय लोगों का कहना है कि रात के समय कुछ लोग दफीने की तलाश में यहां खोदाई करते हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। ग्रामीणों का कहना कहना है कि जुलाई जून को दफीना की तलाश में सुरई मंदिर में खोदाई की गई जबकि जंगल में स्थित बजरंगबली मंदिर में दो पहले ही खोदाई की गई है।
बेतवा, व्यापार और बंजारों ने रचा यहां का समृद्ध इतिहास
क्षेत्रीय इतिहासकार एवं शोधकर्ता डॉ. धर्मेंद्र सिंह के अनुसार सरीला तहसील का जलालपुर गांव जालौन जिले के कदौरा क्षेत्र की सीमा से लगा है। जलालपुर बेतवा नदी पर आधारित व्यापार का प्रमुख केंद्र था। बांदा, महोबा, चरखारी, जालौन और आसपास के क्षेत्रों से व्यापारी यहां पहुंचते थे। नदी मार्ग से अनाज, कपड़ा, नमक, गुड़, घी और अन्य वस्तुओं का कारोबार होता था। व्यापारियों के ठहरने के लिए सराय थीं और सर्राफा बाजार पूरे इलाके में प्रसिद्ध था। मध्यकाल में बंजारा समुदाय बड़े व्यापारी माने जाते थे। बैलों के काफिलों के साथ वह विभिन्न क्षेत्रों में व्यापार करते थे। जलालपुर भी उनके प्रमुख पड़ावों में शामिल था। असुरक्षा के दौर में व्यापारी अपनी बहुमूल्य वस्तुएं सुरक्षित स्थानों पर छिपा देते थे। समय के साथ इन्हीं घटनाओं से जुड़ी बातें लोककथाओं में बदल गईं। हालांकि जलालपुर में किसी दफीने के मिलने का कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। जिला पर्यटन विभाग के अभिलेखों में जलालपुर को ऐतिहासिक धार्मिक स्थल के रूप में दर्ज किया गया है। यहां 108 शिव मंदिर होने का उल्लेख मिलता है। वर्तमान में भी अनेक प्राचीन मंदिर, पंचमुखी काले ग्रेनाइट के शिवलिंग और बेतवा किनारे ऐतिहासिक पक्का घाट इसकी धार्मिक विरासत के साक्ष्य हैं।
इनकी भी सुनिए
वरिष्ठ नागरिक भगवती शरण मिश्र का कहना है कि एक समय जलालपुर की आबादी करीब 65 हजार थी। यहां बड़ा सर्राफा बाजार लगता था और बेतवा नदी के रास्ते दूर-दूर तक व्यापार होता था। शिव मंदिरों की अधिकता के कारण इसे छोटी काशी कहा जाता था। अब चिंता इस बात की है कि दफीने की तलाश में हमारी ऐतिहासिक धरोहरों को नुकसान पहुंच रहा है।
क्षेत्रीय कुलदीप द्विवेदी का कहना है कि करीब 15 दिन पहले बेतवा किनारे स्थित त्रिमूर्ति मंदिर और पक्का घाट के प्राचीन शिव मंदिर परिसर में खोदाई जैसे निशान मिले थे जो आज भी देखे जा सकते हैं। हालांकि किसी ग्रामीण ने खोदाई करते हुए प्रत्यक्ष नहीं देखा है। ऐतिहासिक धरोहरों की सुरक्षा के लिए राज्य पुरातत्व विभाग से सर्वे और स्थायी सुरक्षा व्यवस्था कराई जानी चाहिए।
बीहड़ों में बिखरा है ऐतिहासिक नगर
बेतवा किनारे फैले जंगलों में आज भी प्राचीन महल, मंदिर, हवेलियां और पत्थर की ऐतिहासिक संरचनाएं मौजूद हैं। कई स्थान घने जंगल में बदल चुके हैं जहां तक पहुंचना भी आसान नहीं है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इन खंडहरों का आज तक समग्र पुरातात्विक सर्वे नहीं हुआ। स्थानीय लोगों के अनुसार इनमें कई तीन से चार मंजिला महल भी शामिल हैं। रखरखाव के अभाव में इनमें पेड़-पौधे उग आए हैं। कई कमरों और फर्श पर खोदाई जैसे निशान दिखाई देते हैं।
पर्यटन का केंद्र बन सकता जलालपुर
इतिहासकारों का मानना है कि यदि मंदिरों, महलों, पक्का घाट और जंगलों में फैली ऐतिहासिक संरचनाओं का संरक्षण किया जाए तो जलालपुर बुंदेलखंड के प्रमुख धार्मिक एवं विरासत पर्यटन स्थलों में शामिल हो सकता है। इससे स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे।