इस दीपावली मा कुछ बुद्धिजीवी टाइप के लोग कहत रहैं कि पटाखे ना फोड़ें.. अउर होली मा भी यही लौझड़ टाइप के सियाने लोग कहत रहैं कि रंग ना खेलो पानी बचाओ.. अब बताओ नंगा का नहाए का निचोड़े.. कसम से जी करत रहा कि अइस बोले वाले का कुर्सी मा बांध के ओके नीचे राकेट अउर बम जलाय दई.. अइसेहे हमरे नील वाली गली के मित्र हैं संतोष.. उनसे कोऊ कहिस कि इ बार दिवाली ध्वनिरहित बिना शोरशराबा किये बिगैर आवाज के मनाओ अउर पर्यावरण बचाओ.. तो ऊ टोपा तुरंतै आपन पत्नी का तैयार करवाइस अउर ओका मायके छोड़ आवा.. कहिस ना रही बांस ना बजी बांसुरी..
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राजू श्रीवास्तव
अइसेहे हटिया वाले हमाय गुड्डू दीपावली वाले दिन बइठे दारु पियत रहे तो उनकी पत्नी बिर्झाय गयी.. उनसे कहे लगी तुमका सरम नाही आवत.. त्यौहार वाले दिन बइठे शराब पियत हौ.. तोका पाप लगी पाप.. तो उई बकलोल कहे कि हम तो मजबूरी मा शराब पियत हन.. अरे जब शराब पीके बोतल खाली करब.. तबहीं तो ई बच्चा लोगन का रॉकेट चलाय खातिर खाली बोतल मिली.. इसलिए पियत हन..
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राजू श्रीवास्तव
अच्छा एक अउर मजेदार किस्सा भवा रहा.. दीपावली वाले दिना हमरे मोहल्ले मा कनौजिया अईस तबियत से कूटे गए कि तबहीं से तीन कलर मा मूत रहे हैं.. हुआ यूँ कि कनौजिया आपन पडोसी रामखिलावन के उप्पर बम फेंक दिहिन.. अउर बम फेंक के कहिन बुरा ना मानौ दिवाली है.. सब पकड़ के उनका मारिन तो कहे लाग कि यहू होली मा हमरे उप्पर रंग फेंक के कहिस रहै कि बुरा न मानौ होली है.. तो खूब थुरे गए.. बताओ अईस अईस बुद्धि च्यवनप्राश घूमि रहे हैं...
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राजू श्रीवास्तव
अच्छा मुंबई केर दिवाली बड़ी व्यवस्थित रहत है.. लोग आपन आपन काम धंधा निपटाय के पूजा करि के फिर बाहर इकठ्ठा होत है फिर आतिशबाजी होत है.. उन लोगन का देख के उई दिन पता चलत है कि यहू लोग हमाय साथै यही बिल्डिंग मा रहत हैं.. काहे से बाकी पूरे साल तो कोऊ दिखत नाहीं है.. सब पैसा कमाए मा लगे रहत हैं.. खाली त्यौहार-त्यौहार मिलाई होत है.. अच्छा मुंबई मा आतिशबाजी होत है.. मगर टाइम देख के दस बजे सब आपन आपन घरन मा वापस घुस जात है.. अपने कानपूर मा अईस कुछु नाहीं होत है.. कौनो रोके टोके वाला नाहीं ना.. जी भरि के राकेट छोड़ो.. पटाके छोड़ो.. वइसे हमरी सलाह है कि पटा-के छोड़े का नाही चाही.. अरे पटाये हौ तो साथ निभाओ उस से शादी करौ.. पटा-के छोडो मत.. अउर कुछ लोगन के लिए तो दीपावली का मतलब है जुआ-वली.. ई लोग जम के जुआ खेलत हैं..
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राजू श्रीवास्तव
तब चायनीज वाली लड़ी आवत नहीं रहें.. बड़ी बड़ी मनका वाली लाइट केर झालर होत रही.. अइसेहे एक बार दिवाली पे झालर लगवाए खातिर इलेक्ट्रिशियन का ढूँढा जात रहा.. तो उई आय के कहिस कि चच्चा एतना लेट काम बताय रहे हौ.. अभीन हमका विधायक जी का बंगला सजावे का है.. मानिक बाबू केर पूरी बिल्डिंग सजावे का है.. बहुत बयाना है चच्चा ई बार हमसे ना होई.. हम उई झालर का सही करे के चक्कर मा दुई तीन बार बिजली केर झटकौ खाय गयेन.. बचपन मा हम आपन पिताजी के साथ पटाखा लै जात रहे.. डलिया भर भर के पटाखा खरीदा जात रहा.. डोरा वाली रेलगाड़ी.. टिकिया वाला सांप.. सीको अउर ना जाने का का.. जब हम छोट रहन तो हर दीपावली मा हमार पिताजी हमका मेला ले जाय के फोटू खिंचवावत रहे.. काहे से नए नए कपडा मा सबै सुन्दर लगत हैं.. (झूठ काहे बोलि हमहूँ सुन्दर लगत रहेन).. फिर मेला मा चाट पकौड़ी.. झूला मस्ती.. रिश्तेदारन के हिंया लई जात रहें.. बहुत मजा आवत रहा..
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राजू श्रीवास्तव
एक बार बचपन केर बात है हमरे हिंया कौनो बड़ी सस्ती मिठाई का डब्बा दे गवा रहै.. अम्मा ओका केहू अउर के हिंया भेज दिहिन.. मजा तो तब आवा जब वही मिठाई केर डब्बा दूसर दिन फिर घूमि के हमरेहे घर वापस आय गवा.. दिवाली मा सबका पता होत है कि ध्वनि प्रदुषण होत है.. धुंवा धुंवा हुई जात है.. वायु प्रदुषण होत है.. नुक्सान है.. पर तबहूँ दिया अउर पटाखा केर गंध बहुतै भावत है.. एक बार हम बोतल मा रखी के राकेट छुडावत रहेन तो बोतल गिर गयी अउर उ रोकेट सीधा हमरे मोहल्ले मा इकराम चाचा रहेन उनकी लुंगी मा घुस गवा.. इकराम चाचा तीन हफ्ता तक सब लौंडन का गरियावत भये टाँगे फैलाय फैलाय के चलत रहे.. तो अईस ना करे के चाहि.. अउर भईया आस पास जानवरन का भी ख़याल राखौ..
अउर भईया दिवाली मा छत पे खड़े होय के पूरे शहर केर आतिशबाजी देखे का मजा ही अलग रहत रहा.. अउर भईया उई दिन जौने सबसे जादा ख़ुशी कि बात होत रही ई कि बत्ती नहीं जात रही.. अच्छा हम दिवाली के बाद सुबह छत पर गिरे भये राकेट अउर बाहर रोड पे बिगैर फूटे सीको अउर दूसर पटाखे बीन के उनका मसाला निकार के एक कागज़ पे इकठ्ठा करि के ओमा आग लगावत रहेन.. फुरर सानी जलत रहा, बड़ी तगड़ी रौशनी होत रही.. उई मसाला जले केर बदबू भी खुशबू लगत रही.. वईसे एक बात नहीं समझ मा आवत है कि लोग सुतली बम अउर पटाखा छुडावत भये कान काहे बंद कर लेत हैं.. अरे जब धमाका सुने का नहीं है तो बम फोड़त काहे हौ.. एतना महंगा काहे खरीद के लाय रहेव..लास्ट मा एक्कै बात कहे चाहित है.. कि हमरी बात ध्यान से सुना करौ.. काहे से हमरे घर में हमरी कोई सुनत नहीं है ..।