मित्रों बचपन मा हम एक बात नोटिस किये रहें की जब सब घरों के आदमी काम पर चले जात रहें तो मोहल्ले भर की औरतें कौनो के आंगन मा बइठ के पंचायत करत रहीं...। जेका मेन मकसद होत रहा डेटा ट्रान्सफर...। घर की छत का भी अपन एक अलग फंतासी रही...। कहूं पतंगबाजी होय रही तो कहूं कबूतरबाजी...। थोड़ी बहुत इसकबाजी भी। अइसे मा हमका एक बात याद आई कि एक बार हम सामने वाली छत पर एक चौकस सामान देखा...। मन मा धुकधुकी लग गयी कि को है का है...। थोड़ा बहुत हमरौ दिल लग गवा रहै...। जेके वहां रुकी रही उनके हुंवा कोऊ का चेचक हुई गवा... तो उनकी अम्मा रोज हमसे नीम केर पत्ती तुड़वा के मंगववती रहें...। चेचक तो ठीक हुई गवा पर हम रोज नीम की पत्ती पहुंचावत रहेन। बाद मा पता चला कि जेके चक्कर मा हम ई सब कर रहे हैं...ओकी तो सादी तय हुई चुकी है...। ऊ तो बिन्दकी से हिंया नर्सिंग का एग्जाम देवे आई रही...।
बचपन मा गर्मी मा रोज साम को छत पर पानी छिड़का जात रहा... फिर सबके बिस्तर लाद के छत पर पहुंचाय का पड़त रहा...। लेकिन खुले आसमान के नीचे तारों की छांव मा सोवे का मजा अलग रहा...। सुबह सब आपन आपन बिस्तर छोड़ के निकल लेत रहें...। जब हम नहाय धोय तैयार होत रहें तो अम्मा सबसे पहिले नास्ता करावत रहीं...। जब हम परांठा पेल लेइत रहें तो कहत रहीं की जाओ दौड़ के ऊपर से सारे बिस्तर उठा के लाव...। कसम से अईसी जान जलत रही कि का बताएं...। खैर सबसे छोटे रहन तो ई सब हमरी खोपड़ी पे रहत रहे...।
आपन बचपन मा जब रात मा हम सब खाना वाना खाय के जैसेहे फुरसत पात रहें तो लाइट चली जात रही...। तब सब एक साथ बोलत रहें कि लेव बत्ती चली गयी.. बत्ती चली गयी...। हम कहा ये सब लोग बतावत काहे हैं कि बत्ती चली गयी...। वईसे आजकल इस बत्ती ने सबके बीच का प्यार कम कर दिया है...। बत्ती आतेहे सब आपन-आपन कमरे मा मोबाइल और लैपटॉप लई के घुस जात हैं...। पहिले जब बत्ती जात रही तो सब एक लालटेन के पास बैठ जावा करत रहे...। मौसम सर्दी का होए तो सब मूंगफली खात रहे अउर गर्मी होए तो सत्तू घोर के पियत रहें। आपन लाइन जाए की इत्ती चिंता नहीं रहत रही... जेतना ये कि पता करौ पड़ोसी की भी गयी है कि नहीं...। खैर हम अबकी गर्मी मा हम कानपुर मा ही रहें तो आपन बिटिया अंतरा और बेटवा आयुष्मान के साथ छत पे घूमत रहे...। उस रात जब रात के 10 बज गए तबहूं बत्ती नहीं आई तो हम छज्जे पे खड़े बात करत रहें... हम कहा की चलो जनरेटर चला दिया जाय... तो आयुष्मान बोला की पापा हम लोग अपने आराम के खातिर दूसरों को कित्ता परेशान करत हैं...। कित्ता आवाज करत है अउर जनरेटर से धुंवा अलग फैलिहे...। हम कहा लौंडा बात तो सही कह रहा है...। तबहीं रोड पे खटिया पे लेटे हमार घर के सामने वाले पुत्तू भैया बोले... अरे राजू भइया.. चलाओ चलाओ... जनरेटर चला लेव... बच्चा लोग बंबई से आये हैं... उनका गर्मी लगत होई..। खैर ऊ दिन हम सब बिना जनरेटर चलाये ऐसेहे छत पर सोये...।
दुसरे दिन संतोष के भांजे की सादी का रिसेप्शन रहा तो हम सब हुंवा गए...। तबहीं संतोष हमसे कहिस कि यार ऊ जौन खपटहा सा आदमी रसगुल्ला पेल रहा है... ऊ न तो हम लोगन का रिश्तेदार है ना नातेदार... जीजा कहिन हैं जाय के पता करौ... चलो पूछा जाए कि को हैं ई...। हम लोग ओके पास गए तो संतोष उससे पूछे भैया आप कौन हौ...। हम लोग तो आपका बुलाये नहीं... तो ऊ बोला फिर तो ई आपकेर गलती है.. हम तो टाइम से आ गए ना।