मुस्लिम बहुल इलाकों में पुरखों की चौखट छोड़ चुके हिंदू परिवारों को आज भी त्योहारों पर अपनी पुरानी देहरी की याद आती है। हर साल दिवाली के मौके पर पूर्वजों की ड्योढ़ी पर दीये मुस्लिम परिवारों के लोग जलाते हैं।
कभी खुद आते हैं तो कभी उनके दोस्त या उन घरों में रह रहे मुस्लिम परिवार के लोग दीया जलाकर हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी मिसाल पेश करते हैं। यही इस शहर की गंगा जमुनी सभ्यता की पहचान है और यह परंपरा आज भी कायम है।
बेकनगंज के दादामियां चौराहे पर स्वर्गीय मुंशीराम 1990 में अपना मकान छोड़कर पंजाब चले गए थे। उनके पुत्र वेद भाटिया और अशोक भाटिया हर साल दीपावली पर परिवार के सदस्यों के साथ मकान की चौखट पर दीप जलाने आते हैं। अब इस मकान में भाटिया परिवार के मुंशी अब्दुल हई अपने परिवार के साथ रहते हैं।
जब कभी किसी दिवाली पर न आ सके तो अब्दुल और उनके पारिवारिक दोस्त मुस्तफा तारिक और शाहिद अजीज इस मकान की देहरी को सूनी नहीं रहने देते हैं। वे खुद जाकर दीपक जलाते हैं। इसी तरह चमनगंज के पेशकार रोड पर बने पुराने मकान में कभी राम मोहन मिश्र और किशन मिश्र रहा करते थे।
माहौल बिगड़ा तो यह लोग रामबाग में रहने लगे। इस मकान में अब किरायेदार दिवंगत मोहम्मद उस्मान का परिवार रहता है। आज भी हर त्योहार पर यह लोग अपने पूर्वजों के मकान पर दीप जलाने आते हैं। इस दौरान उनके मित्र इरफान अंसारी भी साथ रहकर इस पर्व को साथ साथ मनाते हैं।
इसी तरह कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से मकान छोड़ कर गए कई हिंदू परिवार दिवाली पर अपने पुरखों की ड्योढ़ी पर दीप जलाने आते हैं और उनके मुस्लिम दोस्त और मोहल्ले के लोग उनके साथ मिलकर इस खुशी में शामिल होते हैं।