कानपुर देहात। एक तरफ विश्व पशु दिवस पर पशुओं के संरक्षण और उनकी सुरक्षा की बात हो रही है। वहीं, दूसरी ओर सड़कों पर घूमते बेसहारा गोवंश पशु कल्याण की जमीनी तस्वीर पर सवाल खड़े कर रहे। गांवों से लेकर कस्बों और प्रमुख मार्गों तक झुंड में बैठे या सड़क पर घूमते गोवंश आए दिन यातायात के लिए खतरा बन रहे। रात में वाहन चालकों को सबसे ज्यादा परेशानी होती है। इनकी वजह से दुर्घटनाएं भी हो रही हैं।
जनपद में गोवंश के संरक्षण के लिए सरकारी स्तर पर गोशालाओं का संचालन किया जा रहा है। यहां पशुओं के चारा, पानी, देखरेख और अन्य व्यवस्थाओं पर सरकारी धन खर्च होता है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में गोवंश सड़कों पर नजर आना व्यवस्था की निगरानी पर सवाल खड़ा करता है। खासकर हाईवे, प्रमुख संपर्क मार्गों और बाजारों के आसपास पशुओं का जमावड़ा वाहन चालकों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है।
विभागीय आंकड़ों की बात करें तो जनपद में कुल 70 गोशालाएं संचालित हैं। इनमें नगरीय क्षेत्र की 14 गोशाला में 2363 गोवंश संरक्षित हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्र की 56 गोशाला में 7254 गोवंश को संरक्षित किया गया है। प्रतिदिन करीब 4.80 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं। सीवीओ सुबोध बरनवाल ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्र की गोशाला में संरक्षित प्रति गोवंश के लिए 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से धनराशि मिलती है जबकि नगरीय क्षेत्र की गोशाला का खर्च नगर निकाय की तरफ वहन किया जाता है। इधर, बेसहारा गोवंश सिर्फ यातायात के लिए ही खतरा नहीं हैं। खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचाना किसानों की बड़ी समस्या है। रात में किसान खेतों की रखवाली करने को मजबूर होते हैं। इससे पशु संरक्षण की व्यवस्था का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है।