कानपुर। प्रदेश की ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है। राज्य सरकार के नए आदेश के तहत अब मौजूदा ग्राम प्रधान ही पंचायतों के प्रशासक नियुक्त किए जाएंगे।
यह व्यवस्था नई ग्राम पंचायतों की पहली बैठक होने तक या अधिकतम छह माह तक लागू रहेगी। पंचायत राज प्रमुख सचिव अनिल कुमार ने शासनादेश जारी किया है। इस दौरान प्रधान केवल सामान्य और नियमित कार्यों का निस्तारण कर सकेंगे। वे कोई बड़ा नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। किसी भी बड़े फैसले, नई योजना या वित्तीय स्वीकृति के लिए जिलाधिकारी की मंजूरी अनिवार्य होगी। पहले कार्यकाल समाप्त होने पर एडीओ पंचायत या सचिव गांवों की जिम्मेदारी संभालते थे। कई जिलों में ब्लॉक स्तरीय अधिकारियों को भी प्रशासक बनाया जाता था। सरकार ने इस बार निर्वाचित प्रधानों को ही प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी है।
सरकार के इस फैसले के पीछे पंचायत चुनाव में संभावित देरी मुख्य वजह है। जनगणना, मतदाता सूची पुनरीक्षण और आरक्षण प्रक्रिया के कारण चुनाव समय पर होना मुश्किल है। यह अंतरिम व्यवस्था गांवों में विकास कार्य प्रभावित न होने देने के लिए है। आदेश जारी होते ही गांवों की राजनीति गरमा गई है। नए दावेदार चुनावी तैयारी में जुटे थे, उनके समीकरण बदल गए हैं। वर्तमान प्रधानों का कहना है कि इससे विकास कार्यों की निरंतरता बनी रहेगी। शासनादेश में स्पष्ट है कि प्रधान कोई बड़ा नीतिगत निर्णय नहीं ले सकेंगे। यदि किसी विशेष परिस्थिति में जरूरी नीतिगत निर्णय लेना पड़े तो प्रस्ताव जिलाधिकारी के समक्ष रखा जाएगा। यह प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जाएगा। मंजूरी मिलने के बाद ही उस पर अमल हो सकेगा।
वर्जन
सरकार के निर्देशों को पालन कराया जाएगा। पहले एडीओ पंचायतों प्रशासक होते थे लेकिन पहली बार प्रधानों को प्रशासक के रूप में तैनात किया गया है। बड़े निर्णय लेने का अधिकार नहीं दिया गया है। -मनोज कुमार, डीपीआरओ