महिलाओं के साथ पुरुषों में भी बांझपन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इसके प्रमुख कारण मोटापा, अनियंत्रित शुगर, धूम्रपान, शराब, तनाव, हार्मोनल असंतुलन, बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण आदि हैं। इसका सबसे गंभीर और प्रत्यक्ष प्रभाव उनकी प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा है। उनके शुक्राणुओं की संख्या और गुणवत्ता में तेजी से गिरावट आ रही है। यह खुलासा जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी और यूरोलॉजी विभाग के ओपीडी में आए रोगियों के अध्ययन में हुआ है।
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बांझपन की समस्या झेल रहे पुरुषों के इलाज पर शोध भी हुआ जिसमें कारण आनुवंशिक, चोट लगने, फाइलेरिया आदि पाए गए लेकिन ओपीडी में आने वाले रोगियों में शुगर और धूम्रपान जैसे कारण प्रमुखता से रहे हैं। हैलट सुपर स्पेशियलिटी के यूरोलॉजी विभाग या एंडोक्रिनोलॉजी विभाग में भेजे जा रहे ऐसे पुरुषों में मोटापा, अनियंत्रित शुगर से नसों का कमजोर होना, धूम्रपान, तनाव, शराब का सेवन और हार्मोन जैसे कारण भी निकल कर आ रहे हैं। एंडोक्राइनोलिस्ट डॉ. खुशबू अग्रवाल ने बताया कि अधिकांश पुरुषों में न केवल सामान्य शुक्राणुओं की संख्या में कमी देखी जा रही है बल्कि उनकी शारीरिक बनावट भी विकृत या असामान्य हो रही है।
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शुक्राणुओं की गतिशीलता और उनकी सही संरचना में आ रहा यह बदलाव स्वाभाविक रूप से गर्भधारण की संभावनाओं को बहुत कम कर देता है। उन्होंने बताया कि 18 से 50 वर्ष की उम्र के पुरुषों में बांझपन का प्रतिशत अलग-अलग है। 18 से 25 वर्ष के उम्र के पुरुषों में 10 से 15 प्रतिशत और 40 से ऊपर उम्र के पुरुषों में ये प्रतिशत 50 या उससे भी ज्यादा हो जाता है। लोग झिझक के चलते दिखाने नहीं आते हैं।
स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. सीमा द्विवेदी ने बताया कि हमारे यहां बांझपन की समस्या लेकर आने वाली महिलाओं में 50 प्रतिशत के पतियों में बांझपन की समस्या होती है। महिलाएं पूरी तरह स्वस्थ होती है। उन्होंने बताया कि प्रदूषण का असर जिस तरह महिलाओं के अंडों पर पड़ता है, उसी तरह पुरुषों के शुक्राणुओं पर भी ये प्रभाव डालते हैं और उसकी गुणवत्ता, आकार, प्रकार और संख्या को कम कर देते हैं। ऐसे में हम उन्हें एंडोक्राइनोलॉजी या यूरोलॉजी विभाग भेज देते हैं। हमारे यहां इलाज नहीं होता है।
शराब, धूम्रपान से प्रजनन तंत्र पर जहरीला प्रभाव
हैलट सुपर स्पेशियलिटी के यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. अनिल वैद्य ने बताया कि शरीर में शर्करा का अत्यधिक स्तर (डायबिटीज) और रक्त में वसा (लिपिड) का असंतुलन हार्मोनल संतुलन को सीधे प्रभावित करता है। उच्च शुगर स्तर टेस्टोस्टेरोन के उत्पादन और शुक्राणुओं के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है। हवा में मौजूद टॉक्सिन्स, हैवी मेटल्स और सूक्ष्म कण शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करते हैं जो सीधे तौर पर प्रजनन कोशिकाओं को क्षतिग्रस्त करते हैं। शराब और धूम्रपान पुरुषों और महिलाओं दोनों के प्रजनन तंत्र पर सीधा जहरीला प्रभाव डालते हैं। धूम्रपान से शुक्राणुओं के डीएनए को भी क्षति पहुंचने का खतरा रहता है। नियमित दिनचर्या, शारीरिक व्यायाम और शर्करा व वसा नियंत्रण से लिपिड प्रोफाइल और शुगर को सामान्य रखा जा सकता है। स्मोकिंग और शराब के सेवन को पूरी तरह बंद करना प्रजनन स्वास्थ्य के लिए पहली शर्त है। समस्या के शुरुआती लक्षणों पर ही विशेषज्ञ डॉक्टरों से परामर्श लेना और जांच कराना आवश्यक है।
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में भी बांझपन पर हुआ शोध
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी और यूरोलॉजी विभाग की ओर से किए गए एक अध्ययन में पुरुष बांझपन के निदान और इलाज को लेकर महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल हुई है। ये शोध 2025 में किया गया और 2026 में जर्नल में प्रकाशित भी हुआ है। शोधकर्ताओं ने 20 से 50 वर्ष के पुरुषों पर अध्ययन में पाया कि शुक्राणु बनने की प्रक्रिया बीच में ही रुक जा रही थी, शुक्राणु सही से बन नहीं रहे थे और उनकी नलिकाओं में रुकावट थी या शुक्राणुओं का उत्पादन काफी कम मात्रा में हो रहा था। पुरुषों में बांझपन का कारण पता लगाने के लिए अभी तक दर्दनाक बायोप्सी करनी पड़ रही थी जिसमें रोगी को दो दिन अस्पताल में भर्ती करना पड़ता था लेकिन इस शोध में डॉक्टरों ने पुरुषों में शुक्राणु की कमी या अनुपस्थिति का पता लगाने के लिए पतली सुई से जांच की। इस तकनीक को फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी (एफएनएसी) कहा जाता है। यह एक सुरक्षित, सस्ती और सटीक विकल्प के रूप में सामने आई है।
एक दिन में हो जाती है जांच
ये अध्ययन डॉ. सबा शाहीन (जूनियर रेजिडेंट), डॉ. योगेंद्र नारायण वर्मा (एसोसिएट प्रोफेसर), डॉ. नीलिमा सचान और डॉ. रोहित सिंह (असिस्टेंट प्रोफेसर) की ओर से संयुक्त रूप से किया गया है और इसे अंतरराष्ट्रीय मेडिकल जर्नल (जेआरएएएस) में प्रकाशित किया गया है। डॉ. योगेंद्र ने बताया कि ये जांच एक दिन में होकर रोगी घर भी चला जाता है और इससे पता चल जाता है। अगर रोगी में आनुवंशिक कारण होता है तो उनमें शुरुआत से ही शुक्राणु नहीं बनते हैं लेकिन जिनमें फाइलेरिया, चोट लगने आदि से नलिकाओं में रुकावट हो जाती है तो उसे ठीक किया जा सकता है और पुरुष पिता बन सकते हैं।