मक्का-मदीना की पाक सरजमीं पर हज करने गए शहर के जायरीनों को बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। खाना, रहना और आना-जाना सब मुश्किल हो गया है। वे लोग ज्यादा खर्च नहीं कर रहे हैं कि हज का सफर 40 दिनों का है, रियाल (करेंसी) खर्च हो गए तो परदेस में किसके सामने हाथ फैलाएंगे। केंद्रीय हज समिति के अफसर, कांसुलेट जनरल का दफ्तर और मोअल्लिमों ने मुंह मोड़ लिया है। हज यात्री अपने रिश्तेदारों को फोन कर अपनी तकलीफें बयां कर रहे हैं। हज ट्रेनरों से भी संपर्क कर मदद की गुहार लगा रहे हैं। इस गुहार में उनके अलफाज हैं कि, ‘बस यूं समझ लीजिए कि हम यहां खून के आंसू रो रहे हैं..’
कर्नलगंज के नूर आलम, मीरपुर कैंट के इस्लामुद्दीन, बेकनगंज के जुनैद और इमरान और मछरिया के जमशेद ने अपने रिश्तेदारों को फोन कर पीड़ा बताई है। 15 सितंबर को लखनऊ से हज यात्रा पर गए जायरीनों को मक्का में हरम शरीफ से करीब दो किलोमीटर दूर पहाड़ी पर बनी 23 नंबर बिल्डिंग में ठहराया गया है। यह वह इमारत है जिसके मालिक ने इन जायरीनों से बताया है कि यह रिजेक्ट बिल्डिंग थी लेकिन हज कमेटी ने उनसे किराये पर ले ली है। घर से जो राशन ले गए थे, किचन सुविधा न मिलने से रखा है। होटल में पेट भर के खाना इसलिए नहीं खा रहे हैं कि कहीं रियाल न खर्च हो जाएं। बिल्डिंग से हरम तक ले जाने का टैक्सी किराया 10 रियाल (करीब 180 रुपये) है। बुजुर्ग हज यात्रियों को दिक्कतें हो रही हैं। हज समिति, कांसुलेट दफ्तर और मोअल्लिमों ने मुंह मोड़ रखा है। राज्य हज समिति के हज ट्रेनर शारिक अल्वी को भी फोन कर शहर के हज यात्रियों ने मदद की गुहार लगाई है।