विभागीय कार्रवाई भी की जा रही है
हालांकि परिचय देने के बाद सभी पीछे हट गए। बता दें नगर निगम मुख्यालय में कार्यरत बाबू (कनिष्ठ लिपिक) राजेश कुमार यादव कार्मिक विभाग, विज्ञापन विभाग का काम देखने के साथ ही तीन महीने से अपर नगर आयुक्त (प्रथम) मोहम्मद आवेश खान का पीए भी है। अपर नगर आयुक्त के अनुसार, राजेश यादव के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा रही है।
जेब से मिले 26 हजार, बोला विज्ञापन शुल्क, पर साक्ष्य नहीं दे पाया
अर्सलान के अनुसार राजेश को घूस की शेष रकम शुक्रवार को देनी थी, पर वह दफ्तर नहीं आया। फोन करने पर शनिवार को रुपये देने की बात तय हुई। राजेश शुक्रवार को दफ्तर आता तो उसी दिन पकड़ जाता। विजिलेंस इंस्पेक्टर प्रदीप यादव ने बताया कि राजेश यादव की तलाशी ली गई तो जेब से 26 हजार रुपये बरामद हुए। उसने इसे विज्ञापन शुल्क बताया, पर साक्ष्य नहीं दे पाया। कोषागार में क्यों नहीं जमा किया? इस सवाल का भी जवाब नहीं दे पाया। राजेश के खिलाफ विजिलेंस थाने में रिपोर्ट दर्ज की गई है।
कोई घूस मांगे तो हेल्पलाइन पर करें शिकायत
विजिलेंस पुलिस अधीक्षक के अनुसार यदि कोई लोक सेवक सरकारी काम करने के बदले रिश्वत मांगे तो सीयूजी नंबर- 9454401872 या रिश्वत विरोधी हेल्पलाइन नंबर-9454401866 पर शिकायत की जा सकती है।
सीसीटीवी कैमरों से जुड़ा टीवी मिला बंद
नगर निगम मुख्यालय स्थित केयरटेकर कार्यालय में लगे टेलीविजन में सीसीटीवी कैमरों का लाइव प्रसारण होता रहता है, पर इस घूसखोरी कांड के बाद यह टीवी बंद रहा। बताया गया कि टीवी खराब हो गया है।
नौकरी के 10,16 और 26 साल पूरे होने में मिलता है एसीपी का लाभ
नगर निगम के एक कर्मचारी नेता ने बताया कि नौकरी में तीन बार एसीपी का लाभ मिलता है। पहला लाभ नौकरी शुरू होने के 10 वर्ष पूरा होने पर। इसी तरह दूसरा और तीसरा लाभ क्रमश: नौकरी के 16 और 26 वर्ष पूरा होने पर मिलता है। लाभ यदि देरी से मिलता है तो उतने साल की बकाया धनराशि एरियर के रूप में एकमुश्त मिलती है।
2011 में जिस विभाग में हुआ था करोड़ों का घोटाला, उसमें कार्यरत था राजेश
सन 2011 में नगर निगम लेखा विभाग में करोड़ों का घोटाला हुआ था। लेखा विभाग के कर्मचारियों ने कई फर्जी खाते खोलकर एसीपी, पीएफ व अन्य भत्तों की रकम इन्हीं में ट्रांसफर कर ली थी। तब राजेश यादव उसी विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद पर कार्यरत था। राजेश उस समय कंप्यूटर पर काम करता था, पर चपरासी होने की वजह से लिखापढ़ी में उसका नाम नहीं आया था।