प्रदूषण के कारण बढ़ रही आंसू सूखने की बीमारी ‘ड्राई आई’ के इलाज में नवजात बच्चे की झिल्ली बड़ी कारगर है। इस झिल्ली के इस्तेमाल से ड्राई आई के एडवांस रोगी को भी निजात मिल रही है। मां के पेट में बच्चा एक झिल्ली के अंदर रहता है।
प्रसव के बाद जब इस झिल्ली का आंखों में इस्तेमाल किया गया तो रोगियों को फायदा हुआ। इसके साथ ही ड्राई आई के रोगी के खून से सीरम निकाल कर इस्तेमाल किया जाता है। इससे भी रोगियों को फायदा हो रहा है।
ये बातें कानपुर में आईएमएसीजीपी रिफ्रेशर कोर्स के अंतिम दिन रविवार को बताई गईं। मेडिकल कॉलेज का नेत्र रोग विभाग इस पर शोध कर रहा है। अब तक इस नुस्खे को 57 लोगों पर आजमाया जा चुका है। रिफ्रेशर कोर्स में सर गंगाराम अस्पताल के विशेषज्ञ पद्मश्री डॉ. आरके ग्रोवर ने ‘मैजिक आफ आई सर्जरी’ विषय पर प्रस्तुति दी। इसके पहले डॉ. ग्रोवर और डॉ. शालिनी मोहन ने पत्रकारों से बातचीत की।
डॉ. शालिनी ने बताया कि मां के गर्भ में बच्चा जिस झिल्ली में रहता है, उसमें पोषक तत्व होते हैं। इससे आंख की सतह अच्छी हो जाती है। जब ड्राई आई के रोगी की आंखों में इसे लगाया गया तो उसे फायदा हुआ। ड्राई आई होने पर आंखों की रोशनी भी जा सकती है।
इस झिल्ली को एमिनियोटिक झिल्ली कहते हैं। इसके अलावा ड्राई आई में खून से निकला आटोलोगस सीरम भी ड्राई आई के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। ड्राई आई में बच्चे की झिल्ली के इस्तेमाल का शोध बायो केमिस्ट्री विभाग के सहयोग से नेत्र रोग विभाग कर रहा है।
डॉ. ग्रोवर ने बताया कि प्रदूषण के तत्व एक तो सीधे आंखों में जाकर एलर्जी पैदा करते हैं। इसके साथ ही जहरीले तत्वों के शरीर में मिलने का दुष्प्रभाव भी आंखों पर पड़ता है। कंप्यूटर, मोबाइल गेम खेलने से भी आंखों को नुकसान होता है। स्कूली छात्रों पर एक शोध में 27 फीसदी बच्चों की आंखें प्रभावित मिलीं।