कानपुर में अवैध तरीके से आ रही सुपारी की आपूर्ति यहां की पान मसाला फैक्ट्रियों में की जा रही है। जीएसटी इंटेलिजेंस के अधिकारियों को इस बात के कई पुख्ता सबूत हाथ लगे हैं। 200 करोड़ रुपये की सुपाड़ी के अवैध कारोबार के भंडाफोड़ के बाद अब ये पान मसाला फैक्ट्रियां भी जांच के दायरे में आ गई हैं। इसके अलावा फर्जी फर्मों के जरिये इस कारोबार की कुछ और परतें खुलेंगी।
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जीएसटी इंटेलिजेंस के सूत्र बताते हैं कि सुपाड़ी के अवैध कारोबार में शहर के कुछ ट्रांसपोर्टर भी शामिल हैं। टैक्स चोरी को अंजाम देने के लिए यह एक संगठित नेटवर्क है, जिसमें हर व्यक्ति की भूमिका तय है। दरअसल पान मसाला कारोबार में 60 फीसदी सेस (उपकर) और 28 फीसदी जीएसटी है। यानी 88 फीसदी टैक्स। इतने भारी भरकम टैक्स से बचने के लिए पान मसाला कारोबारियों ने घोषित कारोबार के बराबर अवैध तरीके से अघोषित कारोबार चला रखा है।
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यह सारा माल घोषित कारोबार की आड़ में बेचा जा रहा है। यदि 200 करोड़ रुपये की सुपाड़ी पान मसाला कारोबार में ही खपी है तो टैक्स चोरी 100 करोड़ रुपये से अधिक की बनती है। इस टैक्स चोरी को पकड़ने के लिए जीएसटी इंटेलिजेंस ने पान मसाला उद्योग पर शिकंजा कसने की तैयारी कर ली है। कानपुर, लखनऊ और दिल्ली की तमाम पान मसाला फैक्ट्रियों से खरीद बिक्री का आंकड़ा मांगा गया है।
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ऐसे पता चला मामला
फर्जी फर्मों के नाम पर बने ई-वे बिल के जरिये सुपाड़ी की खेप कोलकाता और गुवाहाटी से चलकर कानपुर, लखनऊ और दिल्ली आ रही थी। सुपाड़ी संवेदनशील कैटेगरी में शामिल होने की वजह से इसके आवागमन पर नजर रखी जा रही थी। लंबे अंतराल के बाद महसूस किया गया कि सुपाड़ी की जितनी खेप आ रही है, उस मुताबिक टैक्स जमा नहीं हो रहा है। इस पर इसकी पड़ताल की गई।
पता चला कि ई-वे बिल तो सही बनता था ताकि रास्ते में माल की पकड़ न हो सके, लेकिन फर्मों के नाम सही नहीं थे। यानी न माल भेजने वाली फर्म अस्तित्व में होती थी और पाने वाली फर्म। कानपुर, लखनऊ और दिल्ली आते ही माल गायब हो जाता था। अफसरों ने फर्जी फर्मों का तो नेटवर्क पकड़ लिया लेकिन माल किसे भेजा गया इसकी पड़ताल अभी करनी है।