हमीरपुर। जेल की व्यवस्था सुधारने के बजाय जेल प्रशासन बंदियों तक खबरें न पहुंचे इसे दबाने लगा है। बंदियों को अब भी पतली दाल, पानीदार सब्जी और अधपकी रोटियां दी जा रही हैं। वहीं, बंदियों तक जेल के बारे में खबरें न पहुंचे इसके लिए अखबार को बंद कर दिया गया है। इससे पहले जेल के खिलाफ छपने वाली खबरों को अखबार से काटकर निकाल दिया जाता था। इसके बाद बंदियों को समाचार पत्र उपलब्ध कराया जाता था।
जेल में 10 वर्ष पुराने एससी-एसटी मामले में वारंट पर गए बंदी अनिल द्विवेदी की जेल में पिटाई के चलते हुई मौत के मामले में समाचार पत्रों में लगातार खबरें छप रही हैं। इस कारण जेल में बंदियों को अखबार पढ़ने के लिए नहीं दिए जा रहे। बंदियों से मिली जानकारी के मुताबिक उसके पास इतना पैसा नहीं है कि वह अपने खाने की अलग व्यवस्था करा सके। बताया कि जेल डॉक्टर बदल गए हैं लेकिन नए डॉक्टर के स्वभाव का पता नहीं।
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साढ़े सात बजे तक खुलने लगी बैरकें
बंदियों के अनुसार, पहले बैरकें शाम छह बजे तक बंद कर दी जाती थीं लेकिन अब शाम सात-साढ़े सात बजे तक खुली रहती हैं। जेल नियमों के अनुसार बंदी आपस में मिल लेते हैं। अब बंदियों की पिटाई नहीं हो रही है।
एक दो दिन में सभी को पढ़ाए जाएंगे अखबार -
अखबार में प्रकाशित हो रहीं खबरों से ह्यूमर फैलता है। जेल में कुछ बाहरी व हाई प्रोफाइल बंदी व कैदी भी है। जो ऐसे मौकों पर अन्य बंदियों के भड़का सकते है। इसीलिए अखबार अंदर नहीं भेजा जा रहा। कार्यालय में बराबर आ रहा है। एक दोे दिन बाद शांत होने के बाद सभी को पढ़ाया जाएगा। - मंजीव विश्वकर्मा, जेल अधीक्षक।