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पुलिस की सुस्ती पर भारी 'साइबर ठगों की शातिर मिजाजी', कानपुर सेल की ये रिपोर्ट करेगी हैरान

Wed, 02 Jan 2019 01:30 PM IST
gaurav gaurav यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

- साइबर फ्रॉड के 110 में 95 मामलों के निस्तारण से आंकड़े तो दुरुस्त हुए
- लाखों में डूबी रकम हजारों में पीड़ित के खातों में लौटा पाई साइबर सेल
 
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यूपी के कानपुर की साइबर सेल में आए तमाम मामले अब सुलझने की उम्मीद खोते जा रहे हैं। इसे साइबर ठगों की शातिर मिजाजी कहें या पुलिस का सुस्त रवैया जो ठगी की रकम वसूलने में वर्दीवालों के पसीने छूट रहे हैं। ठगों ने किसी न किसी तरह से झांसा देकर लोगों के बैंक खाते व एटीएम से लाखों रुपये पार कर दिए। पीड़ितों की शिकायत पर साइबर सेल ने कार्रवाई तो की, लेकिन लाखों की रकम में कुछ हजार रुपये ही उनके खाते में वापस आए। इन मामलों को साइबर सेल ने गुडवर्क की सूची में दर्ज कर वाहवाही लूटी। अब सेल का दावा है कि वर्ष 2018 में आए साइबर फ्राड के 110 में 95 मामलों का निस्तारण किया गया। 42 लाख छह हजार 358 रुपये पीड़ितों के खाते में वापस कराए गए। ये आंकड़े पीड़ितों के पैसों की रिकवरी के मामले में बौने साबित हो रहे हैं।
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साइबर सेल का खेल
2018 में क्लोन एटीएम, क्लोन चेक, डेबिट व क्रेडिट कार्ड से शातिरों ने एक-दो नहीं पूरे 360 लोगों के चूना लगाया। इनमें 250 मामले शहर के 44 थानों में दर्ज कराए गए।110 मामले सीधे साइबर सेल पहुंचे। 95 मामलों में 60 फीसदी धनराशि लोगों को वापस कराने का दावा साइबर सेल ने किया। एक सूची भी जारी की, जिसमें वापस कराई गई रकम का ब्योरा तो दिया गया है, लेकिन ठगी की रकम का जिक्र नहीं है। अब तक कितने ठग पकड़े गए हैं, इसका भी अभी तक खुलासा नहीं किया गया है।  
 
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जांच करती है साइबर सेल
रेलबाजार स्थित ट्रैफिक पुलिस लाइन परिसर में एसपी क्राइम का दफ्तर है। इसी परिसर में साइबर सेल का ऑफिस है। यहां साइबर ठगी के मामलों की शिकायत पर टीम पड़ताल करती है। टीम पहले पीड़ित के खाते से ट्रांसफर हुई धनराशि को ठग के अकाउंट से निकासी पर रोक लगवाती है। ऑनलाइन खरीदारी के मामले में संबंधित कंपनी को मेल करके ठग की सूचना देती है। फिर कंपनी से पीड़ित के खाते में रकम लौटाने की हिदायत देती है। 
 

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थाने में सिर्फ खानापूरी  
साइबर ठगी की रिपोर्ट संबंधित थाने में दर्ज होती है। थाने में पीड़ित को एफआईआर की कॉपी थमा दी जाती है। इसके बाद मामले की विवेचना थाने के ही किसी दरोगा को सौंप दी जाती है। विवेचक कुछ पर्चे काटता है। फिर धीरे-धीरे फाइल ठंडे बस्ते में चली जाती है। इसके बाद केस में कब एफआर (फाइनल रिपोर्ट) लग जाती है, पीड़ित तक को पता नहीं चलता है।
ये तर्क दिए जाते हैं   
 
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विवेचक कहते हैं कि अधिकांश मामलों में पाया जाता है कि ठग झारखंड, बिहार, महाराष्ट्र, उड़ीसा, केरल जैसे दूरदराज के राज्यों से जुड़े हैं। कई तो नक्सल प्रभावित एरिया के रहने वाले हैं। बिना फोर्स के वहां जाना संभव नहीं है। दूसरी वजह यह है कि संबंधित प्रदेश की पुलिस सहयोग नहीं करती है। तीसरा वजह यह भी है कि दूसरे प्रदेश जाकर आरोपी की गिरफ्तारी के लिए आने-जाने में खर्च होने वाली रकम भी सालों बाद सरकारी खजाने से मिलती है। ऐसे में जान और पैसों दोनों का फंसने का डर रहता है। इसलिए ज्यादातर विवेचक दूसरे राज्यों में जाने से बचते हैं। बहानेबाजी करते हैं।
 
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एसपी क्राइम राजेश यादव ने बताया कि साइबर सेल ने साइबर ठगी के अधिकांश मामलों में पीड़ित को रकम वापस कराई है। कई लोगों को 100 प्रतिशत रकम वापस कराई गई है। कुछ मामले बाकी बचे हैं, जिन पर कार्रवाई चल रही है। साइबर सेल ने सीमित संसाधनों में बेहतर परिणाम दिए हैं।
 
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केस 1-मार्च में कानपुर नवाबगंज के विष्णुपुरी निवासी रिटायर्ड ओएफसी कर्मी आदित्य नारायण मिश्रा के बैंक खाते से 2.50 लाख रुपये साइबर ठग ने पार कर दिए। आदित्य ने साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराई। इस पर उन्हें 42 हजार 848 रुपये मिल गए। बाकी रकम अभी तक फंसी हुई है।
केस 2-जून में कृष्णा नगर, चकेरी के रश्मी कुमार के खाते से 3.40 लाख रुपये निकाल गए। साइबर सेल ने अपने स्तर पर कार्रवाई की। इस पर 3 हजार 770 रुपये ही रश्मी को मिल पाए। बाकी रकम का अब तक कुछ पता नहीं है।
केस 3- सितंबर में शास्त्री नगर निवासी प्राइवेट कर्मी वैभव के तीन क्रेडिट कार्डों से 50 हजार रुपये की दिल्ली में ऑनलाइन खरीदारी की गई। मामला साइबर सेल के पास पहुंचा तो एसबीआई से पांच हजार रुपये उनके खाते में आ गए। 
 
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