कानपुर। सर्कस में अपने हैरतअंगेज करतबों से दर्शकों को दांतों तले उंगलियां दबाने को मजबूर करने वाली नेपाली बालाएं अब नहीं दिखाई देंगी। क्योंकि सरकार ने इसे खतरनाक उद्योग की श्रेणी में शामिल कर दिया है। 26 दिसंबर को इसके लिए बाकायदा गाइड लाइन भी जारी कर दी गई है। इसके तहत सर्कस में नेपाली बच्चों के अलावा अन्य माइनर बच्चे करतब दिखाते नजर नहीं आएंगे। इसकी निगरानी के लिए प्रदेश स्तर पर मुख्य सचिव और जिला स्तर पर डीएम की अध्यक्षता में कमेटी गठित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा निर्देशों पर अमल में हुए कार्यों की प्रगति जानने को लेकर 12 फरवरी को श्रम मंत्रालय ने समीक्षा बैठक बुलाई है।
कानपुर सहित देश भर में जगह-जगह लगने वाले सर्कसों में बड़े पैमाने पर कम उम्र के नेपाली बच्चों (लड़कियां-लड़के) से तरह-तरह के करतब करवाए जाते हैं। इसे लेकर देश में रहने वाले नेपाली समुदाय और नेपाल के लोगों ने केंद्र सरकार से शिकायत की थी। इसके कहा गया था सर्कस चलाने वाले छोटे-छोटे बच्चों के माता-पिता को लालच देकर भारत ले आते हैं काम के दौरान उनका मानसिक और शारीरिक शोषण भी होता है। बाल श्रम उन्मूलन योजना के संयोजक रिजवान अली ने बताया कि सरकार क ा इस ओर ध्यान आकर्षित कराने के लिए नोबल पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से गाइड लाइन बनाने के लिए निर्देश दिए थे। इस पर सरकार ने 26 दिसंबर 2014 को नई गाइड लाइन जारी कर दीं। इसके तहत सर्कस को खतरनाक उद्योग की श्रेणी में डालते हुए सर्कस में काम करने वाले बच्चों को मुक्त कराने और इन बच्चों का शैक्षिक पुनर्वासन करने के निर्देश दिए हैं।