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Kanpur News: डेरापुर में मुस्लिम कारीगर बनाते थे रावण-मेघनाद के पुतलों की पोशाक

Mon, 12 Oct 2026 12:46 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
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डेरापुर। नगर की रामलीला शुरुआत से ही आपसी भाईचारे की मिसाल रही है। मुस्लिम कारीगर रामलीला में रावण-मेघनाद के पुतलों की पोशाक बनाते थे। अब रेडीमेड पुतला बनता है। रावण पुतला दहन दशहरा के बजाय एकादशी को होता है। नगर की रामलीला 150 साल पुरानी है।
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बुजुर्ग अमर नाथ मिश्रा बताते हैं कि रामलीला आयोजन की तैयारियों में हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर सहयोग करते थे। तब संसाधन कम थे। आपसी सहयोग से ही लीला धीरे-धीरे कर आगे बढ़ी। रावण, कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों के लिए कपड़े मुस्लिम समुदाय के बुजुर्ग प्यारे चाचा, जलीलुल कदर और इकबाल अहमद बनाते थे। इतना ही नहीं राज्याभिषेक के दिन राम चबूतरे के फर्श को रंगोली से सजाया जाता था। कन्हैयालाल गुप्ता, जलील खां, नूर मास्टर, जनार्दन गुप्ता, रामगोपाल और बड़ेलाल राठौर समेत कई लोग इसमें सहयोग करते थे।
रंगोली इतनी आकर्षक होती थी कि पूरा चबूतरा कालीन से ढका मालूम पड़ता था। यह रंगोली और रामराज्यभिषेक देखने दूरदराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचते थे। उन्होंने बताया कि रामलीला के मंचन के दौरान क्लॉट मास्टर खलील और हारमोनियम मास्टर मजीद अंसारी बताते थे। उनकी संगत से संगीत कर्णप्रिय हो जाता था। अब भी यहां सामाजिक सौहार्द है। मुस्लिम समाज के लोग चंदा देकर रामलीला मंचन में सहयोग करते हैं। एकादशी पर पुतला दहन के पीछे जानकारों का कहना है कि दशमी को रावण तीर लगने से घायल हुआ था लेकिन उसने एकादशी को प्राण त्यागे थे।
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पुलिस उठाती थी दंगल का खर्च
रामलीला से जुड़े रामविलास बताते हैं कि मेला के दौरान तीन दिन का दंगल होता था। अब यह परंपरा नहीं है। पहले दो दिन कुश्ती में हार-जीत के आधार पर पहलवानों को पुरस्कार दिए जाते थे। तीसरे दिन के दंगल का खर्च थाना पुलिस उठाती थी। पहलवानों के लिए मेवा वाले दूध की व्यवस्था गांव के लोग करते थे।
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बाललीला से हुई रामलीला की शुरुआत
नगर के मदन मिश्रा कहते हैं कि बुजुर्ग बताते हैं कि रामलीला की शुरुआत बाल लीला से हुई। बाद में जमींदार परिवार के जगत नारायण मिश्र ने रामलीला बढ़ाने में योगदान किया। जिला पूर्ति अधिकारी के पद पर कार्यरत रहने के दौरान उन्होंने बाल रामलीला के कलाकारों के लिए रामलीला से संबंधित वस्त्र, मुकुट, शस्त्र, गदा और धनुष-बाण आदि की व्यवस्था कराई। राम, लक्ष्मण और सीता की मूर्तियों को घर-घर ले जाने के लिए लकड़ी का सिंहासन नुमा वाहन भी बनवाया गया था।
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