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वाहन चलाने में सबसे लापरवाह भारतीय, आए चौंकाने वाले आंकड़े

Sun, 19 Nov 2017 06:34 PM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
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देश में दुनिया के एक  प्रतिशत वाहन हैं, पर हादसे छह गुना होते हैं। हर मिनट एक सड़क दुर्घटना और प्रति छह मिनट में एक मौत हो रही है। 70 प्रतिशत दुर्घटनाओं में हेड इंजरी (सिर में गंभीर चोट) लगती है। पहले 72 घंटे में ही सर्वाधिक मृत्यु होती हैं। इसकी वजह वाहन चलाने में भारतीयों की लापरवाही है। यह जानकारी शनिवार को पीजीआई चंडीगढ़ के न्यूरो सर्जन डॉ. राजेश छाबड़ा ने दी।
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कानपुर के जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज आडिटोरियम में आयोजित नेशनल न्यूरोलॉजी कांफ्रेंस-2017 में आए वरिष्ठ न्यूरो सर्जन डॉ. राजेश छाबड़ा ने बताया कि सड़क हादसों में मौत की मुख्य वजह वाहन चलाते समय हेलमेट, सीट बेल्ट न लगाना है। सर्वाधिक दुर्घटनाएं उप मार्गों से मुख्य मार्ग पर गाड़ी मोड़ते समय होती हैं। इसके बाद सबसे ज्यादा हादसे ओवरटेक करते समय होते हैं। यातायात सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन कर ऐसे हादसों और मौतों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

गंभीर मरीजों को एबीसी (एयरवे, ब्रीथिंग, ब्लड प्रेशर) नियंत्रित करने के बाद बड़े अस्पताल के लिए रेफर करना चाहिए। एमबीबीएस डॉक्टरों को एटीएलएस (एडवांस ट्रॉमा लाइफ सपोर्ट सिस्टम) और पैरा मेडिकल स्टाफ को भी एबीसी का प्रशिक्षण देने पर जोर दिया। गोल्डन आवर (हादसे के चार घंटे के भीतर) ऐसा कर मरीजों को सेकेंड्री इंजरी से बचाया जा सकता है। जान भी बच सकती है।
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ऐसे करें इलाज
डॉ. राजेश के अनुसार दुर्घटना का शिकार मरीज बेहोश हो तो तुरंत उसका सीटी स्कैन कराएं। उसके सिर में खून का थक्का या कुछ और दिक्कत पता चले तो तुरंत न्यूरो सर्जन के पास रेफर करें। देश में मात्र 2000 न्यूरो सर्जन हैं। ज्यादातर बड़े शहरों में हैं। बी श्रेणी के शहरों में न्यूरो सर्जन की बहुत जरूरत है। इसके लिए भारतीय चिकित्सा परिषद को न्यूरो सर्जन की सीटें बढ़ानी चाहिए।

वाल्व में खराबी से बच्चों को ब्रेन स्ट्रोक
एम्स के डॉ. प्रशांत जौहरी ने डॉक्टरों को बच्चों में होने वाले ब्रेन स्ट्रोक की जानकारी दी। बच्चों के हृदय के वाल्व में खराबी, हृदय की धड़कन अनियंत्रित होने, नसों में खून का थक्का जमने की प्रवृत्ति आदि वजहों से भी बच्चों में ब्रेन स्ट्रोक होेने की आशंका रहती है। फोर्टिस हॉस्पिटल, नई दिल्ली के डॉ. जेएस मेहरवाल ने डॉक्टरों को दिमाग में खून पहुंचाने वाली नसों के ब्लॉकेज की सर्जरी, दिल्ली से ही आए डॉ. दीपक कुमार और डॉ. सुमन कुशवाहा ने दिमाग में सूजन, मानसिक विकार का इलाज बताया। केजीएमयू, लखनऊ केे डॉ. नीरज कुमार ने प्रसव के बाद होने वाले मानसिक विकारों के बारे में बताया।
कार्यशाला के आयोजक मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नवनीत कुमार ने उच्च स्तरीय विकास समिति के समन्वयक नीरज श्रीवास्तव, आईएमए अध्यक्ष डॉ. प्रवीण कटियार आदि को सम्मानित किया। आयोजन सचिव डॉ. आलोक वर्मा, डॉ. अर्चना कुमार, डॉ. सौरभ अग्रवाल, डॉ. गौरव गुप्ता, डॉ. विशाल गुप्ता, डॉ. आरके वर्मा आदि शामिल रहे।

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सतर्कता से हादसे नियंत्रित करना संभव-डॉ. संजय
एसजीपीजीआई के न्यूरो सर्जरी विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय विहारी ने कहा कि सतर्कता से हादसे नियंत्रित करना संभव है। उन्होंने सभी दोपहिया वाहन सवारों को हेलमेट पहनने, चार पहिया वाहन सवारों को सीटबेल्ट लगाने, छोटी सड़क से बड़ी सड़क पर जाते समय गाड़ी रोककर दोनों तरफ देखने के बाद रास्ता खाली होने पर ही गाड़ी आगे बढ़ानी चाहिए। ओवरटेक करते समय विशेष ध्यान दें। यदि कोई घायल दिखे तो तुरंत नजदीकी अस्पताल में ले जाएं। वहां मरीज की एपीसी देने के बाद रेफर किया जाए तो हादसों से होेने वाली मौत की संख्या कम हो सकती है। कहा कि न्यूरो सर्जन का लोड कम करने के लिए हेड इंजरी के मरीजों को बाद में इलाज के लिए पुनर्वास केंद्र स्थापित होने चाहिए। दुर्घटनाग्रस्त मरीजों का इलाज करने वाले डॉक्टरों की कमी पूरी करने के लिए ट्रामेट्रोलॉजी में एमसीएच कोर्स शुरू करने पर जोर दिया।

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तनाव से भी लकवा- डॉ. अजय
राम मनोहर लोहिया अस्पताल, लखनऊ के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. अजय कुमार सिंह के अनुसार तनाव, धूम्रपान, उच्च रक्तचाप, डायबिटीज के मरीजों को लकवा होने का खतरा ज्यादा रहता है। अटैक पड़ने के चार घंटे के भीतर यदि टीपीए थिरैपी (इंजेक्शन) लग जाए तो उसकी जान बचाई जा सकती है, पर यहां जागरूकता के अभाव और विशेषज्ञों की कमी की वजह से ज्यादातर मरीज समय से न्यूरोलॉजिस्ट के पास नहीं पहुंच पाते।
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लकवा के लक्षण
- शरीर का एक तरफ का हिस्सा शिथिल होना
- हाथ, पैर की ताकत कम होना
- चेहरा टेढ़ा होना
- बातचीत करने समय जवान लड़खड़ाना

ऐसा हो तो रहें सतर्क
- हाई बीपी, सिर के साथ गर्दन में भी दर्द, बार-बार नाक से खून आना
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