नोट बंदी का संकट अब श्रमिकों की दो वक्त की रोटी पर आ गया है। 90 फीसदी से अधिक बंद फैक्ट्रियों के श्रमिकों के सामने शहर छोड़ने की स्थिति पैदा हो गई है। 20 दिन से खाली बैठे श्रमिकों को खोली का किराया और घर खर्च भारी पड़ा तो अपने गांवों की ओर पलायन शुरू कर दिया। उद्यमियों और कारोबारियों का अनुमान है कि अब तक 10 हजार से ज्यादा श्रमिक शहर छोड़कर जा चुके हैं।
कानपुर यूपी का सबसे बड़ा औद्योगिक शहर है। नोटबंदी के बाद यहां चार हजार से अधिक लघु और घरेलू उद्योगों में उत्पादन ठप है। एक लाख से अधिक श्रमिकों, कामगारों की रोजी रोटी छिन गई है। नोटबंदी के बाद से अब तक इन श्रमिकों का काम उनकी जमापूंजी से चलता रहा, लेकिन अब जरूरत के लिए जोड़े गए रुपये खत्म हुए तो शहर का खर्च भारी पड़ने लगा। शहर के औद्योगिक क्षेत्रों के आसपास बनी कालोनियों और बस्तियों में श्रमिकों के लिए किराये पर उठे कमरे खाली होने लगे हैं। कुछ श्रमिकों ने सिर्फ अपने परिवार को ही यहां से शिफ्ट किया है और खुद साझे का कमरा लेकर समूह में रह रहे हैं।
मार्च से पहले नहीं सुधरेंगे हालात
कुछ इकाइयों में तो सौ फीसदी तक काम बंद है। उद्यमियों ने श्रमिकों को अगले निर्देशों तक छुट्टी दे दी है। उद्यमियों का मानना है कि अब तीन से चार माह तक ऐसे ही हालात रहने हैं। कैश फ्लो बढ़ा भी तो उद्योग पुरी रफ्तार से नहीं चल पाएंगे। यह साल रोजगार के लिए संकट पैदा करने वाला रहेगा। अभी बड़ी संख्या में श्रमिकों का और पलायन हो सकता है।
जाजमऊ टेनरी एसोसिएशन के महामंत्री जावेद इकबाल बोले करेंसी की किल्लत की वजह से टेनरियों में 90 फीसदी तक काम बंद है। हालात सुधरने तक मजदूरों की छुट्टी कर दी गई है। बड़ी संख्या में बाहरी राज्यों के श्रमिक घरों को लौट गए हैं।
इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन महामंत्री आलोक अग्रवाल ने कहा फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप है तो श्रमिकों की जरूरत ही नहीं है। बीते 15-20 दिन से काम न मिलने के चलते मजदूर और श्रमिक शहर छोड़कर चले गए हैं। कुछ ने अपने परिवार वहां भेज दिए हैं और खुद कई लोग मिलकर एक साथ रह रहे हैं।
उद्योग व्यापार मंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्याम बिहारी मिश्रा बोले कैश न होने से मजदूरों का भुगतान रुका पड़ा है। जिनका भुगतान हो गया है उनके लिए अब काम की दिक्कत है। बड़ी संख्या में मजदूर शहर छोड़कर चले गए हैं। हालात सुधरने पर ही वापस आने की उम्मीद है।
मजदूरों का दर्द
रूप सिंह ने कहा फैक्ट्रियों में काम करने वाले बिहार और पश्चिम बंगाल के साथी शहर छोड़कर चले गए हैं। प्रदेश के ही अन्य शहरों से आए मजदूरों ने परिवार को गांव भेज दिया है।
उधर सुशील का कहना है, फैक्ट्रियों से काम छूटने के बाद अब मजदूरी की तलाश में लगे रहते हैं। कभी काम मिल गया तो ठीक नहीं तो बिना कमाई के दिन बीतता है।