वीरेंद्रजीत सिंह ने शिक्षकों एवं पूर्व छात्रों का आभार किया। इस दौरान प्राचार्य डॉ. विपिन कौशिक, प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष डॉ. केके गुप्ता, प्रबंध समिति की संयुक्त मंत्री नीतू सिंह, अध्यक्ष प्रबंध समिति आदित्यशंकर बाजपेई, सह सचिव प्रबंध समिति सुरेंद्र कक्कड़, नवदोय विद्यालय समिति के सदस्य अनिल कुमार गुप्ता मौजूद रहे।
शिक्षा ऐसी जो छात्र के अंत:करण में छिपी प्रतिभा को निखारे
सरसंघसंचालक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ डॉ. मोहनराव भागवत ने कहा कि विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा का पहला उद्देश्य छात्रों के अंत:करण में छिपी प्रतिभा को बाहर लाना होना चाहिए। शिक्षा सुसंस्कृत करने वाली हो। ज्ञान का उपयोग कैसे करना है और कब करना है यह अनुभव विकसित करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि संस्कारवान बनने के लिए अपने निकट के लोगों आदर्श बनाएं। बेहतर हो अपने गुरु को आदर्शमान संस्कार ग्रहण करें। हम जैसे हैं उसके पीछे जाएंगे तो उन्नति मिलेगी और हम जैसे नहीं हैं उसके पीछे जाएंगे तो उन्नति कदापि नहीं मिलेगी।डॉ. भागवत ने कहा कि अंग्रेजी बोलना अच्छी बात है, लेकिन मातृभाषा न भूलें।
स्कूलों में यूनिफार्म धोती न हो कोई बात नहीं, लेकिन घर में किसी शुभ अवसर पर धोती पहननी हो और यह न आए यह गलत है। उन्होंने कहा कि ऐसे विद्यालयों की संख्या बढ़े जो मूल्यों को अधिक महत्व दे। नई शिक्षा नीति विद्यार्थियों को यही सुसंस्कृति, मानवीय मूल्य, आवरण और व्यवहार सिखा रही है।
शिक्षा में जो भी ज्ञान दिया जाता है, वह शिक्षाऔर अनुभव से मिलता है। पढ़ना लिखना जरूरी है, लेकिन कई अल्प शिक्षित लोग खुद सक्ष्म हुए और दूसरों को भी मजबूत किया। डॉ. भागवत ने अमेरिका के करोड़पति का किस्सा सुनाया कि कैसे चर्च में घंटी बजाने वाला शख्स कैसे अपने विचारों, अनुभव से करोड़पति बना। छात्र को संस्कारवान बनाने वाले स्कूलों को बढ़ाएं। स्कूलों में शिक्षा के साथ संस्कार मिलना बेहद जरूरी।