जिस सरोवर का जल भयंकर रोगों को जड़ से खत्म करने की ताकत रखता है, जिसका रहस्य जानने के लिए वैज्ञानिक तक डेरा जमाए रहे, जहां का सफेद कमल शिव अर्चना के लिए दूर-दराज के शहरों तक जाता था वहां अब ‘काला साया’ मंडराने लगा है। आदिगुरु द्रोणाचार्य और उनके पुत्र अश्वस्थामा की तपस्थली के नाम से मशहूर कानपुर शिवराजपुर का ‘गंधर्व सरोवर’ ‘काली नजर’ के शिकंजे में फंस गया है यहां का औषधी रूपी जल अब गायब होता जा रहा है। पानी के अभाव में सरोवर की मछलियां भी मर चुकी हैं।
गंधर्व तालाब में स्नान करते थे भक्त
अश्वत्थामा के जिंदा होने और हर रोज शिव अर्चना करने आने की चर्चाओं से मशहूर शिवराजपुर के खेरेश्वर मंदिर के पास बने इस तालाब के आसपास रहने वाले बुर्जुगों ने बताया कि पहले भगवान भोले नाथ का जलाभिषेक करने से पहले भक्त गंधर्व तालाब में स्नान करते थे, मान्यता थी कि इस तालाब में नहाने से चेचक, खुजली, खमौरी, बात सहित कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं, यह भी मान्यता थी कि गंधर्व तालाब का स्त्रोत सीधे गंगा मैया से जुड़ा है इसलिए सरोवर में पूरे वर्ष पानी रहता था। यहां के औषधि रूपी जल की जांच के लिए एक बार वैज्ञानिक भी आये थे।
अश्वत्थामा के जिंदा होने का सबूत देता है ये शिव मंदिर
खेरेश्वर धाम मंदिर कानपुर
खेरेश्वर धाम की मान्यता
शिवराज के खेरेश्वर धाम की मान्यता है कि द्वापर युग में यह गांव पहले गुरु द्रोणाचार्य का आरायण वन हुआ करता था। यहीं पर द्रोणाचार्य ने पांडवों और कौरवों को शस्त्र विद्या सिखायी। मंदिर के महंत आकाश पुरी गोस्वामी कहते हैं कि वह 36 पीढ़ियों से खेरेश्वर महादेव की पूजा कर रहे हैं। मंदिर के पास द्रोणाचार्य की कुटिया बनी थी। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भी यहीं रहा करते थे। महाभारत के युद्ध के दौरान अश्वत्थामा ने पांडवों के पुत्रों की छल से हत्या कर दी जिसके बाद भीमसेन ने अश्वत्थामा के माथे में लगी मणि निकालकर उसे शक्तिहीन बना दिया। भगवान श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को श्राप दिया वह धरती पर तब तक पीड़ावश जीवित रहेगा जब तक स्वयं महादेव उसे उसके पापों से मुक्ति न दिला दें। तभी से ये कहा जाता है कि महादेव से मुक्ति की प्रार्थना के लिए यहां अश्वत्थामा हर रोज सबसे पहले जल चढ़ाने आता है।
मान्यताः शिव यहां सफेद रंग के शिवलिंग के रूप में स्वयं प्रकट हुए थे
दूधेश्वर और खेरेश्वर महादेव का शिवलिंग
खेरेश्वर धाम से 200 मीटर की दूरी पर महाभारत कालीन दूधेश्वर मंदिर बना हुआ है। ऐसी आस्था है कि यहां भगवान शिव सफेद रंग के शिवलिंग के रूप में स्वयं प्रकट हुए थे। इस शिवलिंग की पूजा हजारों सालों पहले स्वयं गुरु द्रोणाचार्य ने शुरू की थी। दूधेश्वर मंदिर के पुजारी केशव प्रसाद शुक्ल ने बताया कि मुगलकालीन शासक औरंगजेब ने इस गांव के सभी मंदिरों को ध्वस्त कर दिया था। यहां तक कि दूधेश्वर महादेव और खेरेश्वर महादेव के शिवलिंग को खंडित करने के लिए उस पर अपनी तलवार से कई वार किये, तलवार की वार के प्रमाण आज भी दोनों शिवलिंगों में देखे जा सकते हैं।
बिल्हौर क्षेत्र के गंगा नदी तट पर करीब चार हजार सालों से आदिकालीन आस्था के मुख्य केंद्र खेेरेश्वर महादेव मंदिर का शिवलिंग स्वयंभू है। मान्यता है कि इसी स्थान पर आदि गुरु द्रोणाचार्य ने महाभारत काल में कौरवों और पांडवों को शस्त्र शिक्षा दी थी। गुरु द्रोणाचार्य की कुटी के कई अवशेष अब भी दंडी आश्रम पर खुदाई के दौरान मिलते हैं। अति प्राचीन खेरेश्वर महादेव मंदिर, गंगा घाट और दंडी आश्रम पर शासन-प्रशासन और भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा ध्यान नहीं देने से दिनोंदिन ये धरोहरें नष्ट होती जा रही हैं। खेरेश्वर महादेव मंदिर के महंत सुरेंद्र पुरी ने बताया कि ऐसी मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ ब्रह्मांड भ्रमण के दौरान कुछ समय के लिए यहां रुके थे तभी यहां ईश्वरी कृपा से अनंतकाल में स्यंभू शिवलिंग की उत्पति हुई थी। स्थान के महत्व को देखते हुए महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य ने गंगा नदी के तट पर अपनी कुटिया बनाई और अपने शिष्यों कौरवों और पांडवो को शस्त्र शिक्षा दी। यहीं पर द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का भी जन्म हुआ। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के श्राप के कारण अश्वत्थामा आज भी रोजाना ब्रह्म मुहूर्त में खेरेश्वर महादेव का गंगा जल से अभिषेक करने आते हैं जिसके साक्ष्य भक्तों को स्पष्ट दिखाई देते हैं। पुजारी कमलेश पुरी ने बताया कि खेरेश्वर मंदिर निहंगी गद्दी का है, कुछ दशक पहले नागा शिव भक्त यहां आया करते थे, लेकिन संसाधनों के अभाव में अब वह नहीं आते।
शासन-प्रशासन ध्यान दे तो खेरेश्वर को मिले मान
धार्मिक स्थल के रूप में आसपास क्षेत्र में ख्याति पाने वाले खेरेश्वर मंदिर, खेरेश्वर गंगा घाट और दंडी आश्रम सहित देश-दुनिया का एक मात्र अश्वत्थामा मंदिर दुर्दशा का शिकार हैं। अराजक तत्व पुरातात्विक धरोहरों को क्षति पहुंचा रहे हैं और देखरेख के अभाव में कई शिलालेख, भवन, कुएं, पात्र व अन्य पुरातात्विक धरोहर नष्ट हो रही हैं। राजकीय संग्रहालय और भारतीय पुरातत्व विभाग का ध्यान भी अभी तक इस धार्मिकस्थली की ओर नहीं गया है। राजा सती प्रसाद के द्वारा भगवान शिव के लिए बनाया गया हाथी द्वार भी मरम्मत के अभाव में दिनों-दिन जमींदोज हो रहा है।