आज जैसे ही सतयुग के ऋषियों की परिक्रमा का समय समाप्त हुआ, शाम 4 बजे भगवान कामतानाथ जी मंदिर के मुख्य कपाट खुले। अदंर का नजारा देखकर पुजारी हैरान रह गए। देखा कि भगवान कामतानाथ जी की प्रतिमा के मुख से दूध की धारा बह रही है। और मुख के अंदर काफी मात्रा में दूध विध्यमान है। यह दूध रूपी प्रसाद सभी भक्तों में बांटा गया।
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पौराणिक एवं ऐतिहासिक तीर्थ स्थल चित्रकूट आज भी इन विचित्र घटनाओं से जाना जाता है। यहां कामतानाथ जी मंदिर में आज मंगला आरती के समय पौराणिक कामदगिरि मुखारविंद से दूध की धारा प्रकट हुई है। अनादिकाल से कामदगिरि मुखारविंद से प्रतिवर्ष कभी दूध और कभी जल की धारा आती रही है विगत 46 वर्षों बाद मुखारविंद से दूध की धारा प्रगट हुई है। दर्शन के लिए हजारों लोगों का तांता लगा हुआ है।
मुखारविंद के प्रमुख पुजारी भरत शरण रामायणी ने जब प्रातः मंगला आरती के लिए भगवान कामतानाथ जी के पट खोले तो उनके मुख से दूध की धारा बह रही थी। उन्होंने तत्काल मुख के नीचे बर्तन रखा। उनका जैसे श्रंगार होता है श्रृंगार करके आरती की। श्री रामायणी जी ने बताया कि प्रभु श्रीराम ने कामतानाथ जी के 11:05 पर वर्ष दर्शन एवं पूजा की थी।
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प्रतिमा में दांत की जगह शालिग्राम
मंदिर में विराजमान भगवान कामतानाथ जी की मूर्तियां
- फोटो : अमर उजाला
कामदगिरि अनादि है और उनके मुख में दांत की जगह शालिग्राम विराजते हैं। जिनमें दो बाहर निकलते हैं। 5 उन्ही के मुंह में दांत की जगह जड़े हुए हैं जो प्राकृतिक है उन्ही शालिग्राम को स्नान कराने से पूर्व कभी दूध कभी जल की धारा प्रतिवर्ष निकलती है।
46 वर्ष बाद निकली दूध की धारा
मंदिर के पुजारी ने बताई हैरान कर देने वाली बात
- फोटो : अमर उजाला
विगत 46 वर्षों से उनके मुख से दूध की धारा नहीं निकली थी जो इस वर्ष प्रकट हुई है। श्री रामायणी जी ने बताया कि इससे पूर्व जो मुख्य पुजारी श्रीकांत जी थे जिनकी मृत्यु 90 वर्ष की आयु में लगभग 3 वर्ष पूर्व हो चुकी है उन्होंने 65 वर्ष कामदगिरि भगवान की सेवा की। उनके सामने भी आज से 46 वर्ष पूर्व दूध की धारा प्रगट हुई थी। तुलसीकृत रामचरितमानस और बाल्मीकि रामायण में कामदगिरि मुखारविंद के कई उल्लेख और कई वर्णन है जिसमेॆ यह बताया गया है कि कामदगिरि भे राम प्रसादा, अवलोकत अपहरद विशादा।।
भगवान प्रभु श्रीराम ने कामदगिरि के पास बनाई थी कुटी
चित्रकूट में भगवान कामतानाथ जी का मंदिर
- फोटो : अमर उजाला
प्रभु श्रीराम जब चित्रकूट वनवास काल में आए तो मत्तगयेन्द्र भगवान की अनुमति से कामदगिरि के पास ही उन्होंने अपना कुटी बनाई और प्रतिदिन कामदगिरि की पूजा अर्चना करते थे।
ये हैं पूरी कहानी
भगवान कामतानाथ की मूर्ति को स्नान कराते मंदिर के पुजारी
- फोटो : अमर उजाला
उन्होंने बताया कि भगवान प्रभु श्रीराम ने कामदगिरि को ही फिर अपना स्वरूप प्रदान किया है। जब भगवान साढे 11 वर्ष बाद चित्रकूट छोड़कर आगे के लिए प्रस्थान करने लगे तो कामदगिरि ने कहा कि प्रभु आपने इतना स्नेह दिया है अब आप चले जाएंगे तो मेरा यहां पर कौन आदर सत्कार करेगा इस पर प्रभु श्री राम ने अपना ही स्वरूप कामदगिरि को प्रदान करते हुए कहा कि अनंत काल तक तुम अर्थ धर्म काम मोक्ष को देने वाले कामदगिरि के नाम से ही विख्यात रहोगे। तुम्हारी पूजा अर्चना करने वाले को मेरी पूजा अर्चना का लाभ मिलेगा। तब से कामदगिरि में प्रति माह की अमावस्या को एक विशाल मेला लगता है जिसमें 5 लाख से 10 लाख श्रद्धालु आते हैं।
भगवाना कामतानाथ के मंदिर में दीपावली पर जुटते हैं लाखों श्रद्धालु
कामदगिरि की परिक्रमा लगाते हैं जब अमावस्या सोमवती हो जाती है और दीपावली में यह संख्या बढ़कर 25 से 30 लाख तक पहुंच जाती है। फिलहाल चित्रकूट की जनता श्रद्धालु इस बात से पूरी तरह से वाकिफ है कि कामदगिरि मुखारविंद से कभी गंगा जी की धारा तो कभी दूध की धारा निकलती रही है और जैसे ही उनको इस बात की सूचना मिली हजारों हजार की संख्या में श्रद्धालु वहां पहुंचे और उस चरणामृत का पान किया। कीर्तन भजन आदि शुरू हो गया है सभी का मानना है अधर्मियों का नाश होगा और देश में सुख शांति वैभव बढ़ेगा लोग खुशहाल होंगे।