कानपुर स्थित ग्लाइडर्स इंडिया लिमिटेड में मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम तैयार किया जाएगा। इसके लिए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की इकाई हवाई वितरण अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान (एडीआरडीई) की ओर से विकसित तकनीक जीआईएल को ट्रांसफर की गई है। ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी की प्रक्रिया पूरी कर ली गई है। छह महीने में पैराशूट सिस्टम तैयार कर लिया जाएगा। ऐसा होने से अमेरिका पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। अभी तक इसे वहीं से आयात किया जाता था।
मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम (एमसीपीएस) पैराट्रूपर्स के लिए विशेष मददगार होता है। यह पैराशूट सिस्टम ऐसा है, जिसके जरिये पैराट्रूपर्स हवाई जहाज से 30 हजार फीट की ऊंचाई से भी छलांग लगाने पर जमीन पर सुरक्षित उतर सकते हैं। यह प्रणाली अभी अमेरिका सहित अन्य विकसित देशों के पास है, जो 200 किलो वजन उठाने में सक्षम है। इसके नीचे उतरने की गति 280 किमी प्रति घंटा होती है। इसमें लगे ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) में लोकेशन सेट कर दिया जाता है। इसके माध्यम से दुर्गम इलाकों में पैराट्रूपर्स को तय लक्ष्य के आसपास उतरने में आसानी होती है।
स्वदेशी मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम बनने से भारत रक्षा क्षेत्र में एक कदम और आगे बढ़ गया है। इस सिस्टम में ग्लाइड अनुपात, गतिशीलता, हल्के वजन और पेलोड ले जाने की क्षमता होती है। सिस्टम में नौ-सेल सेमी-एलिप्टिकल रैम एयर पैराशूट, अत्याधुनिक ऑक्सीजन सिस्टम, प्रोग्रामेबल पैरा कंप्यूटर शामिल होता है। यह हाई एल्टीट्यूड हाई ओपनिंग (एचएएचओ) 30,000 फीट की ऊंचाई से कूद, हाई एल्टीट्यूड मीडियम ओपनिंग (एचएएमओ) 30,000 फीट की ऊंचाई से कूद और 10,000 फीट तक कहीं भी खुल सकने में सक्षम होता है। इसके साथ ही यह हाई एल्टीट्यूड लो ओपनिंग (एचएएलओ) 30,000 फीट की ऊंचाई से कूद और 9,000-5,000 फीट के बीच कहीं भी खुलने में भी सक्षम है।
दुर्गम क्षेत्रों में तय लोकेशन के आसपास आसानी से उतरने के लिए मिलिट्री कॉम्बैट पैराशूट सिस्टम पैराट्रूपर्स के लिए काफी अहम सिद्ध होगा। डीआरडीओ की इकाई एडीआरडीई ने इसकी तकनीक विकसित करने में सफलता पाई है। अब यह तकनीक जीआईएल को मिल गई है। आधुनिक पैराशूट सिस्टम को विकसित करने की दिशा में काम शुरू हो गया है
। - एमसी बालासुब्रमणियम, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक, जीआईएल