विधवा के प्यार में अंधा था अजय
अपर जिला जज तृतीय कंचन सागर ने एकतरफा प्रेम में विधवा को तेजाब से जलाने वाले अजय पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। यह पूरी रकम पीड़िता को क्षतिपूर्ति के रूप में दी जाएगी। मुकदमे को इस अंजाम तक लाने के पीछे भी विधवा का हौसला और हिम्मत है। पति की मौत के बाद बिधनू की खरगपुर सोसाइटी स्थित अपने मायके में रही। एक रस्सी फैक्टरी में काम किया। तेजाब से हमले के बाद पूरी हिम्मत से लड़ाई लड़ी। न तो दबाव में आई, न किसी धमकी से डरी। पीड़िता ने कोर्ट में भी बयान दिया था कि अजय के घर वाले समझौते के लिए दबाव बनाते थे। समझौता न करने पर धमकी देते थे कि अजय छूटकर आएगा तो जान से मार डालेगा। मगर पीड़िता पीछे नहीं हटी...डटी रही।
प्रस्ताव के साथ लाया था तेजाब की बोतल
दोषी करार दिया गया दो बच्चों का बाप अजय वास्तव में दरिंदा ही था। कल्याणपुर मवईया का रहने वाला अजय चार मई 2022 को विधवा के घर आया तो शादी का प्रस्ताव लेकर था, लेकिन साथ में तेजाब की बोतल भी लाया था। पीड़िता के इनकार करने पर उसने यही तेजाब उसके ऊपर उड़ेल दिया। पड़ोसियों ने पुलिस और उसके पिता को सूचना दी। उर्सला और लखनऊ के केजीएमयू में इलाज चला।
सबूतों और गवाहों ने पहुंचाया जेल
एडीजीसी ओमेंद्र दीक्षित ने बताया कि 14 सितंबर 2022 को कोर्ट में आरोप तय हुए थे। अभियोजन की ओर से पीड़िता और उसके पिता सहित सात गवाह कोर्ट में पेश हुए। आरोप तय होने के बाद सबूतों और गवाहों के आधार पर कोर्ट ने अजय को दोषी मानकर सजा सुनाई।
पीड़िता की बहादुरी को कोर्ट ने सराहा
फैसले में कोर्ट ने भी कहा कि पीड़िता ने न सिर्फ अपनी चोटों को सहन किया बल्कि खुद न्यायालय में गवाही देकर बहादुरी से पूरी घटना को बताया। इस घटना का भार पीड़िता को पूरे जीवन उठाना होगा, इसलिए अजय को 30 साल की कठोर कारावास देने से ही न्याय की मंशा पूरी होगी।
कोर्ट ने की सख्त टिप्पणी, ठुकराई रहम की अपील
सुनवाई के दौरान एडीजीसी ओमेंद्र दीक्षित ने तर्क रखा कि पीड़िता पर तेजाब डालकर अभियुक्त ने गंभीर सामाजिक अपराध किया है। इसलिए कठोर दंड दिया जाए, जबकि बचाव पक्ष ने पहला अपराध होने के आधार पर रहम की दुहाई दी थी। कोर्ट ने कहा कि अजय का अपराध गंभीर है। एसिड अटैक की चोटों की शारीरिक सीमाएं गहरी और स्थायी होती हैं जो उनके मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यक्षमता पर सीधा प्रभाव डालती हैं। विकृति और विकलांगता के परिणामस्वरूप पीड़ित स्थायी रूप से दुर्बल हो जाते हैं और उन्हें अपना जीवन, अपना काम, अपनी शिक्षा छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ता है। कोर्ट ने रहम की अपील ठुकराते हुए सख्त सजा सुनाई।