हजरत अलाउलहक उद्दीन मखदूम शाह आला का 757वां सालाना उर्स अदब-ओ-एहतराम के साथ मनाया गया। गुरुवार को कुल शरीफ के मौके पर खानकाह से लेकर पूरा जाजमऊ क्षेत्र श्रद्धालुओं से भरा रहा।
कुल शरीफ के बाद हुई दुआ में मुल्क में फिरकापरस्ती और दहशतगर्दी से निजात और शहर व मुल्क के अमन-चैन की दुआ कराई गई। शहर के इस सबसे बड़े उर्स में हिंदू-मुस्लिम समेत सभी वर्गों के लोगों ने हाजिरी लगाई और मन्नतें मानीं।
बुधवार रात को खानकाह में हुई महफिल-ए-समां के दौरान ही अकीदतमंदों का दरगाह पर आना शुरू हो गया था। सुबह फजिर की नमाज के बाद श्रद्धालु पहुंचने लगे। हिंदू-मुस्लिम समेत सभी वर्गों के लोगों ने मन्नतें मानीं, जिनकी मुरादें पूरी हो गई थीं, उन्होंने अपनी मन्नतें पूरी कीं। चादर चढ़ाई, जगह जगह जायरीनों में तबर्रुक बांटा गया।
कुल शरीफ के मौके पर खानकाह के सज्जादानशीन अदनान राफे, दरगाह कमेटी के अध्यक्ष इरशाद आलम, मौलाना कारी दिलशाद कारी, कारी उस्मान बरकाती, कारी फारूख, हाफिज मिनहाज, हाफिज नियाज, मौलाना आजाद अशरफी, कारी मोहम्मद अली ने कुल की रस्म अदा कराई, फातिहा पढ़ी गई।
याना मदरसा संचालक मौलाना हाशिम अशरफी ने दुआ कराई। इसमें दहशतगर्दी, फिरकापरस्ती से निजात, मुल्क में अमन-चैन, गरीब बेटियों की शादी, मियां-बीवी के बिगड़े रिश्तों को बनाने, इस दुनिया से विदा हो चुके लोगों की बख्शिश की दुआ की गई। शहरकाजी मौलाना आलम रजा नूरी भी मौजूद रहे।
उर्स में कुल शरीफ के दौरान खानकाह में लगे नीम के पेड़ के पत्तियां भी लोग खाते हैं। मान्यता है कि कुल के वक्त साल में एक बार नीम मीठी हो जाती है। तमाम बीमारियों को इस वक्त नीम की पत्तियां खाने से मुक्ति मिलती है। सभी वर्गों के लोग कुल के दौरान पेड़ के आसपास ही पहुंच जाते हैं।