महालक्ष्मी की पूजा बुधवार को है। शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी राधाष्टमी से प्रारंभ होकर 16 दिन का यह व्रत बुधवार को पूरा होगा। इस दिन हाथी पर सवार महालक्ष्मी की मूर्ति की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसी मान्यता है कि महालक्ष्मी के पूजन से धन-धान्य की कमी नहीं रहती है।
आचार्य पवन तिवारी ने बताया कि इस दिन सुबह उठकर छह बार हाथ-पैर धोकर 16 दूर्वा से स्नान करें। इसके बाद 16 गांठे (आटे के मीठे पुआ), गांठों युक्त मालती पुष्प (सफेद रंग), कपूर, चंदन आदि से लक्ष्मी नम: मंत्र से प्रत्येक सामग्री महालक्ष्मी की मूर्ति को अर्पित करें। इसके बाद सफेद धागे में 16 गांठे लगाकर पुरुष अपने दाहिने हाथ और स्त्रियां बाएं हाथ में बांधें।
16 अक्षत लेकर महालक्ष्मी की कथा करें। कथा पूरे होने के बाद 16 कन्याओं या ब्राह्मणों को दान दें। इसके बाद अपने व्रत का पारण करें। पूजा-अर्चना का सही समय सुबह 10 बजे से प्रारंभ होकर 11:30 बजे तक है। यह श्रेष्ठ मुहूर्त है।