विशेष प्रकार के रसायन और मेटल का इस्तेमाल
टैंकों, हेलीकाॅप्टरों, नौ सेना के युद्धक जहाजों में इसका इस्तेमाल पहले से ही हो रहा है। इसकी मारक क्षमता 1800 मीटर है। पहले ट्रायपॉड यानी कि जिस पर गन रखी जाती थी। इसका वजन 11 किलो था। जिसे अब घटाकर 9 किलो कर दिया गया है। इसके लिए कुछ विशेष प्रकार के रसायन और मेटल का इस्तेमाल किया गया है।
निर्माणी के लिए बड़ी उपलब्धि
इसी तरह इसमें लगने वाली गन का वजन 14 किलो था। इसके भी वजन 3-4 किलो कम किया गया है। एसएएफ के महाप्रबंधक सुरेंद्रपति ने बताया कि 7.62 गुणा 51 एमएम मशीन गन (मैगगन) का कुल वजन घटकर 20 किलो से कम कर दिया गया है। ये निर्माणी के लिए बड़ी उपलब्धि है।
ड्रोन माउंट गन शहर में जल्द बनना होगी शुरू
निर्माणी में आधुनिक ड्रोन के साथ ही गन लगाई जाएगी। इसके लिए निर्माणी में ड्रोन खुद ही निर्माण किया जाएगा। ड्रोन माउंट गन की मारक क्षमता 300 मीटर होगी। जो ऊंचाई पर जाकर या छिपे दुश्मनों को खत्म कर सकेगी। इसके लिए निर्माणी में काम शुरू कर दिया गया है। ड्रोन निर्माण तकनीक के लिए आईआईटी कानपुर से जल्द हाथ मिलाया जाएगा। इसकी तैयारी की जा रही है।
मशीन गन (मैगगन) की खासियत
- कैलिबर: 7.62 गुणा 51 एमएम।
- लेंथ: 1255 एमएम।
- वजन: 9 किलो बिना मैग्जीन के।
- रेंज: 1800 मीटर।
- फायर: 650-1000 राउंड/मिनट।