बहुजन समाज पार्टी प्रत्याशियों के लिए दिल्ली दूर ही रही है। पार्टी गठन से अब तक हुए नौ चुनावों में आठ में प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई है। नगर सीट से एक भी बार बसपा को जीत नहीं मिली। मुस्लिम, ब्राह्मण, वैश्य, सिख सभी को प्रत्याशी बनाया, लेकिन जीत नसीब नहीं हुई।
बिल्हौर और 2009 के पहले अस्तित्व में रही घाटमपुर लोकसभा में भले बसपा के हाथी की सवारी कर राजाराम पाल और प्यारे लाल संखवार संसद पहुंच गए हों, लेकिन नगर सीट से एक बार भी बसपा का प्रत्याशी नहीं जीता है।
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पार्टी यहां से मुस्लिम, दलित, सिख, वैश्य और ब्राह्मण प्रत्याशी उतार चुकी है, लेकिन कोई जीत दिलाने में कामयाब नहीं रहा। पार्टी गठन से अब तक हुए नौ आम चुनावों में से आठ में प्रत्याशियों जमानत तक जब्त हुई थी। इस बार पार्टी ने ठाकुर प्रत्याशी के रूप में कुलदीप भदौरिया पर दांव खेला है।
पहले चुनाव में शरीफ को मिले थे महज 2.64 फीसदी मत
14 अप्रैल 1984 को बनी बसपा ने अपने गठन के बाद पहला आम चुनाव नौंवी लोकसभा के लिए वर्ष 1989 में लड़ा। इस चुनाव में बसपा ने कानपुर समेत देश की 245 सीटों पर प्रत्याशी उतारे। हालांकि पार्टी सिर्फ मायावती की दावेदारी वाली बिजनौर, नगीना और दो अन्य सीटें जीतने में सफल रही। ज्यादातर जगहों पर उनके उम्मीदवारों की जमानतें जब्त हो गई।
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अपने इस पहले लोकसभा चुनाव में कानपुर में बसपा की ओर से मुस्लिम नेता शरीफ को उम्मीदवार बनाया गया। शहर सीट पर 24 प्रत्याशियों के बीच हुए चुनावी रण में जीत तो दूर की बात वे अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। उन्हें महज 11219 यानी 2.64 फीसदी मतदाताओं का समर्थन मिला। वह चौथे स्थान पर रहे।
वर्ष 1991 में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा सुप्रीमो कांशीराम ने कानपुर सीट पर रामनाथ को मौका दिया। चुनाव में 39 दावेदारों के बीच रामनाथ को 3.94 फीसदी (15874) वोट मिले। वे पांचवें स्थान पर रहे और जमानत भी जब्त हो गई।
वर्ष 1996 के चुनाव में बसपा ने एक बार फिर मुस्लिम प्रत्याशी पर दांव लगाया। इस बार शर्राफुद्दीन अहमद चुनाव में उतरे। उन्हें अब तक के सर्वाधिक नौ फीसदी वोट मिले। वह 51,333 वोट पाकर 64 प्रत्याशियों के बीच तीसरे स्थान पर रहे। हालांकि जमानत जब्त हो गई थी।
वर्ष 1998 के चुनाव में पार्टी प्रत्याशी रहे पवन गुप्ता 7.27 फीसदी (49474) वोट पाकर जमानत न बचा सके। वह 14 प्रत्याशियों में चौथे स्थान पर रहे। वहीं वर्ष 1999 के आम चुनाव में बसपा ने सिख समुदाय के मान सिंह बग्गा को मैदान में उतारा। पुराने प्रत्याशियों की तरह ये भी जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतारे और जमानत गवां बैठे।
इन्हें सिर्फ 4.15 फीसदी यानी 26374 वोट मिले, 15 प्रत्याशियों में चौथे स्थान पर रहे। कैडर वोट बैंक संभालने को वर्ष 2004 में पार्टी ने दलित नेता अनुभव चक को उम्मीदवार बनाया। उन्हें 27,962 वोट मिले। वह 16 प्रत्याशियों में चौथे स्थान पर रहे। जमानत भी जब्त हुई।
वर्ष 2009 में ब्राह्मण बाहुल्य कानपुर सीट पर जीत का खाता खोलने के लिए पार्टी ने कांग्रेस सांसद श्रीप्रकाश जायसवाल के सामने इटावा की सांसद रहीं सुखदा मिश्रा को पैराशूट प्रत्याशी बनाकर उतारा। सुखदा को 3.48 फीसदी (48374) वोट मिला। वह 18 दावेदारों में तीसरे स्थान पर रहीं। वर्ष 2014 के चुनाव में बसपा ने तीसरी बार मुस्लिम चेहरे सलीम अहमद पर दांव लगाया।
वह भी पिछले उम्मीदवारों की तरह जीतना तो दूर जमानत तक न बचा सके। वह 22 प्रत्याशियों में तीसरे स्थान पर रहे। उन्हें 53218 (3.3 फीसदी) वोट मिले। वहीं सपा से गठबंधन के चलते बसपा ने वर्ष 2019 के चुनाव में कानपुर में अपना प्रत्याशी नहीं उतारा। पार्टी ने सपा उम्मीदवार राम कुमार का समर्थन किया, हालांकि वह भी जमानत न बचा सके। उन्हें 5.72 फीसदी वोट मिला।