कानपुर। अगर इरादा पक्का है तो मंजिल मिलना तय है। कुछ ऐसा ही इरादा बनाया था कल्याणपुर निवासी रश्मि सचान ने। वह इंजीनियरिंग का क्षेत्र छोड़कर खेती करने के लिए आगे आईं और आज उसमें न सिर्फ सफलता हासिल की है बल्कि लोगों के स्वास्थ्य का भी जैविक खेती के साथ ख्याल रख रही हैं। जब उन्होंने खेती करने के बारे में बात की तो परिवार के लोग नाराज हो गए लेकिन साथ उनके ससुर ने दिया और एक बीघा जमीन खेती करने के लिए दे दी। सफलता मिली तो आज वे साढ़े पांच एकड़ में खेती कर रही हैं। वर्तमान से सप्लाई से ज्यादा उनकी सब्जियों की डिमांड है।
कल्याणपुर निवासी रश्मि सचान ने गाजियाबाद से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की और 10 साल इसी क्षेत्र में दिल्ली और बंगलूरू में नौकरी की। उन्होंने बताया कि कोरोना के दौरान हम वापस कानपुर आ गए। सोचा क्या करें छुट्टियां हैं तो गांव ही घूम आएं। घाटमपुर के पास गांव चतरीपुर में जाना शुरू किया। वहां जाकर मेरी रुचि खेती की तरफ हुई जबकि मैं खुद मैकेनिकल इंजीनियर और पति सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं। कभी गांव के परिवेश में भी नहीं रहे और न ही परिवार में किसी ने खेती की है।
जब खेती करने के लिए सोचा तो परिवार और दोस्त सभी ने मना किया कि इतना पढ़ने लिखने के बाद क्या तुम खेती करने के बारे में सोच रही हो। काफी मेहनत और सफलता की उम्मीद भी कम ही होगी। अच्छा खासा कॅरिअर है लेकिन उस समय मेरा साथ मेरे पति और ससुर ने दिया। उनके सहयोग से कोशिश की और धीरे-धीरे सफलता मिली। मैंने खेती के लिए प्रशिक्षण लिया। कई किसानों से मिली और उनसे जानकारी ली। इससे एक बात समझ आई कि फसलों में यूरिया बहुत प्रयोग हो रहा है जो सेहत के लिए हानिकारक है तो मैंने जैविक खेती करने की सोची।
जैविक खाद का प्रयोग कर सरसों, धनिया, चना, मटर, अरहर, हल्दी, पपीता, अमरूद, सागौन आदि फसलों को उगाया। देसी खादों से उत्पादन पर असर काफी आया क्योंकि हमने कोई भी केमिकल प्रयोग नहीं किया। सोसाइटी में भी जागरूकता फैलाई कि पेस्टिसाइड वाली फसलों के प्रयोग से बचें। हमारा माल कानपुर के अलावा दिल्ली और बंगलूरू भी जाता है। मांग अधिक है और सप्लाई उतनी नहीं होती है। इसलिए जल्द ही हम जमीन को खरीदकर ज्यादा जगह पर खेती करेंगे ताकि सप्लाई कर सकें। रश्मि ने खेती के जरिये 10 लोगों को रोजगार दे रखा है।