मजदूर दिवस: कुशल श्रमिकों की कमी से जूझ रही औद्योगिक नगरी, जानें कैसे होगा सुधार
Tue, 01 May 2018 01:29 PM IST
प्रदीप अवस्थी, अमरउजाला कानपुर
सार
- दूसरे राज्यों और विदेशी उत्पादों के आगे नहीं टिक पाते अपने उत्पाद
- होजरी, चमड़ा, इंजीनियरिंग, केमिकल, डिटरजेंट उद्योग में ज्यादा संकट
- उद्यमियों के आगे उत्पादन और गुणवत्ता सुधारना चुनौती
कानपुर शहर के औद्योगिक विकास की राह में स्किल्ड लेबर (कुशल श्रमिक) की कमी सबसे बड़ा रोड़ा है। यह कमी सिर्फ होजरी और चमड़ा उद्योग के सामने नहीं है। शहर के अन्य प्रमुख उद्योगों केमिकल, इंजीनियरिंग टूल्स, डिटरजेंट और प्लास्टिक भी इस संकट से गुजर रहे हैं। पिछले पांच सालों में शहर में औद्योगिक ग्राफ तो बढ़ा है लेकिन स्किल्ड लेबर की कमी की वजह से उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ा है। ऐसे में कानपुर का उद्यमी अपने को पिछड़ा पाता है। किसी दूसरे प्रदेश की तुलना में उतना ही पैसा खर्च करने के बाद न तो उसके उत्पाद की मांग बढ़ रही है और न ही मुनाफा।
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यह है संकट
डेमाे पिक
- मालूम नहीं रहता कि एक दिन, एक सप्ताह या एक माह में कितना प्रोडक्शन कर पाएंगे।
- बेहतर से बेहतर सामान और मशीन देने के बाद भी फिनिशिंग में कमी रह जाती है।
- अकुशल कारीगरों की वजह से मशीनों में टूटफूट, खराबी, ज्यादा होती है।
- मशीनों का मेंटिनेंस खर्च तो बढ़ता ही है, नौसिखिया श्रमिक प्रोडक्ट भी खराब कर देता है।
- केमिकल इंडस्ट्री में तापमान, तत्वों में मिलावट की मात्रा, रखरखाव की कुशलता बिना ट्रेनिंग के नहीं आती। शहर में इसका अभाव है। इस कारण हादसे भी होते हैं।
गुणवत्ता में निखार न होने से दूसरे राज्यों का कब्जा
उत्पाद की गुणवत्ता में निखार न आने की वजह से बाजार पर दूसरे राज्यों का कब्जा होता जा रहा है। शहर के जिन उत्पादों की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान है, वे भी अपनी स्थिति बचाए रखने के लिए जूझ रहे हैं। जो स्थिति होजरी या गारमेंट सेक्टर में है, कमोबेश वही शहर के प्लास्टिक, केमिकल और डिटरजेंट उद्योग में है। इन उद्योगों के उत्पादों को तमिलनाडु, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में बने उत्पादों से कड़ी टक्कर मिल रही है।
इतना अंतर
यूपी में अंडरगारमेंट का 80 फीसदी बाजार दूसरे राज्यों का है। 12 फीसदी कानपुर का और आठ फीसदी यूपी के अन्य शहरों का है।
- यूपी में होजरी के अन्य कपड़ों का 90 फीसदी बाजार दूसरे राज्यों का है। पांच फीसदी कानपुर का और पांच फीसदी यूपी के अन्य शहरों का।
- देश में कानपुर के लेदर प्रोडक्ट की 27 फीसदी भागीदारी है, अन्य राज्यों की 73 फीसदी। जबकि चमड़े का उत्पादन कानपुर में सबसे ज्यादा होता है।
केस-1
शहर के चमड़ा उद्यमी विदेशी कंपनियों के लिए सिर्फ जॉब वर्कर के तौर पर काम करते हैं। यानी जैसी क्वालिटी या डिजाइन वे तैयार करके देते हैं, वैसा ही बनाना उद्यमियों का लक्ष्य होता है। कुशल कारीगरों के अभाव में उससे अलग और अच्छा नहीं दे पाते। इसी कारण उद्यमियों को अपने उत्पाद की मुंह मांगी कीमत भी नहीं मिलती। अच्छे डिजाइन बनाने में हम फिसड्डी हैं। तकनीकी जानकारी न होने से अच्छी क्वालिटी नहीं दे पाते। केस-2
शहर में करीब तीन सौ होजरी यूनिटें हैं। इन यूनिटों में लगी निटिंग मशीन में यदि कोई इलेक्ट्रॉनिक पार्ट
खराब हो जाता है तो उसे ठीक करने वाले मैकेनिक ढूंढे नहीं मिलते। शहर में सिर्फ आठ से 10 ही ऐसे मैकेनिक हैं, जो इन मशीनों को ठीक कर पाते हैं। इसमें भी कुछ अच्छे हैं बाकी काम चलाऊ। हर दिन चार पांच यूनिटों में कोई न कोई कमी बनी रहती है। इससे उत्पादन प्रभावित होता है।
उद्यमी बोले-
स्किल्ड लेबर न होने की वजह से विदेश में बने उत्पादों के आगे हमारा प्रोडक्ट कमजोर साबित होता है। दुनिया में 30 फीसदी चमड़ा कारोबार पर चीन का कब्जा है। वह नंबर वन पर है। हम तीन फीसदी पर ही हैं। - ओपी पांडेय, कार्यकारी निदेशक, कानपुर उन्नाव लेदर क्लस्टर
पॉलीटेक्निक में पढ़ाए जाने वाले कोर्स अब काम के नहीं रहे। कामगारों को इस बात का भी प्रशिक्षण देना होगा कि उत्पाद और उसकी गुणवत्ता को कैसे निखारें। खर्च कैसे बचाएं। - मनोज बंका, प्रदेश अध्यक्ष, प्रॉविंशियल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन
श्रमिक का आशय अब सिर्फ माल की ढुलाई या लदाई करने वाले से नहीं है। श्रमिक तो इंडस्ट्री की जान होता है। वह जितना कुशल होगा, उत्पादन का स्तर उतना ही बेहतर होगा। - बलराम नरू ला, प्रमुख होजरी उद्यमी
आईटीआई और पॉलिटेक्निक के स्टूडेंटों को प्रैक्टिकल नॉलेज देने के लिए इंडस्ट्री में ट्रेनिंग दी जाती है, लेकिन इनकी संख्या इतनी कम होती है कि इसका फायदा हर इंडस्ट्री को नहीं मिल पाता। - आलोक अग्रवाल, अध्यक्ष, आईआईए कानपुर चैप्टर
ऐसे दूर होगा संकट
- टूल रूम की स्थापना के बाद उद्योगों की जरूरत के लिहाज से कोर्स कराए जाएं।
- आईटीआई और पॉलिटेक्निक के कोर्स नए सिरे से डिजाइन हों।
- एमएसएमई विकास संस्थान उद्योगों की जरूरत के हिसाब से कोर्स करवाए।
- कौशल विकास केंद्र संचालक की कमाई का जरिया न होकर स्किल्ड लेबर तैयार करने के लिए हों।
- कोर्स की फीस इतनी कम हो जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग ट्रेनिंग ले सकें।
- किसी एक फैक्ट्री के मजदूरों को ट्रेंड करने का प्रोग्राम भी चलना चाहिए।