पति की दीर्घायु और संतान प्राप्ति की कामना के लिए किया जाने वाला वट सावित्री व्रत तीन जून को है। सोमवार होने की वजह से सोमवती अमावस्या भी है। इस दिन जो भी पूजा, गंगा में स्नान और दान करेगा उसे सहस्त्र फल की प्राप्ति होगी। इसी दिन शनि जयंती भी है। ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को भगवान शनि का जन्म हुआ था।
आचार्य अमरेश मिश्रा और आचार्य मनोज कुमार द्विवेदी ने बताया कि ज्येष्ठ मास की अमावस्या को वट सावित्री पूजा व्रत किया जाता है। हमारे ऋषियों ने सतयुग से वट वृक्ष की महत्ता पर विशेष शक्ति और भक्ति सूचक सूत्र लिखे हैं। वैसे तो भारत में अनेक प्रसिद्ध वट वृक्ष हैं।
इनमें प्रयागराज अक्षय वट, गया का बोधि वट, वृंदावन का बंशी वट, उज्जैन का सिद्ध वट एवं कुरुक्षेत्र का सर्वसिद्धि दायक महावट ऐसे हैं जिनमें वट सावित्री व्रत का उल्लेख है। इसमें सौभाग्यवती महिलाएं अपने पति और परिवार की रक्षा के लिए सावित्री की तरह व्रत का पालन करती हैं।
यह व्रत अखंड सौभाग्य, सभी रोगों, कष्टों को नष्ट करने वाला एवं संतान प्राप्ति के लिए अति महत्वपूर्ण है। इस वर्ष रोहिणी नक्षत्र, सोमवती अमावस्या होने के कारण विशेष फलदायी सिद्ध होगा।
पूजन विधि
कच्चे धागे को हाथ में लेकर वट की 12 परिक्रमा करते हुए उसमें लपेट दें। साथ ही मीठे आटे का फल बनाकर ऐपन, सिंदूर, फल, फूल आदि बरगद को अर्पित करें।
यमराज ने दिया यह बड़ा वरदान
सावित्री के पति धर्म से प्रसन्न होकर यमराज ने वर रूप में अंधे सास-ससुर को आँखें दीं और सावित्री को सौ पुत्र होने का आशीर्वाद दिया एवं सत्यवान के प्राणों को लौटा दिया। इस प्रकार सावित्री ने अपने सतीत्व के बल पर अपने पति को मृत्यु के मुख से छीन लिया।