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अपनों की सताई हुई इन महिलाओं ने रची सफलता की इबारत, संघर्ष से फिर संजोई जिंदगी

Fri, 31 Aug 2018 02:20 PM IST
यूपी डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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डेमो पिक
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‘कोमल है कमजोर नहीं तू, शक्ति का नाम ही नारी है, जग को जीवन देने वाली मौत भी तुझसे हारी है....।’ इन पंक्तियों को सार्थक करते हुए कानपुर की कुछ महिलाओं ने अपने दम पर सफलता हासिल की है। परिवार की सताई हुईं ये महिलाएं समाज और परिवार के डर से डटकर लड़ीं। खराब हालातों का पूरे धैर्य के साथ मुकाबला किया। अब ये अपनी जिंदगी को नए सिरे से संवार रहीं हैं। सखी केंद्र की नीलम चतुर्वेदी कहती हैं कि अपनों से परेशान महिलाओं को केवल सपोर्ट और अच्छी काउंसिलिंग की जरूरत होती हैं। आज वह अपने हुनर की बदौलत बच्चों का पेट पाल रही हैं। आइए जानते हैं कानपुर की ऐसी ही कुछ महिलाओं के बारे में...  
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अपनों की सताई हुई इन महिलाओं ने रची सफलता की इबारत
पहले काउंसलिंग कराई, अब काउंसलर

दो साल की थी जब पिता जी गुजर गए। मां ने घरों में काम करके पढ़ाया और मेरी और बहन की शादी की। दोनों को ही ससुराल अच्छी नहीं मिली। बहन को तो ससुराल वालों ने जलाकर मार दिया। मुझे भी दहेज के लिए धमकी मिलती। काफी मारपीट होती थी। मेरा हश्र भी बहन की तरह न हो इसलिए मैं वहां से भाग आई। किसी ने सखी केंद्र का पता दिया तो वहां गई और आपबीती सुनाई। वहां की संचालिका नीलम चतुर्वेदी ने पूरे परिवार को बुलाकर समझाया गया। पति के साथ यशोदानगर में रहने लगी। इसके बाद खुद के पैरों पर खड़े होने का मन बनाया। एलआईसी एजेंट के रूप में काम शुरू किया। अब घर की साज-सज्जा की चीजें बनाकर मार्केट में बेचती हूं। इसके अलावा काउंसल का भी काम कर रही हूं। अब जीवन सामान्य हो गया है। - निशा गुप्ता, यशोदा नगर, कानपुर  

खुद के पैसों से लड़ रहीं केस


2014 में मध्य प्रदेश के रहने वाले युवक से शादी हुई थी। 2015 में पति और ससुराल वाले मारपीट करने लगे। मेरा एबार्शन करा दिया। इसके बाद मैं एकदम टूट गई। जीवन को खत्म करने का फैसला किया। लोगों ने समझाया तो सोचा इनके लिए अपना जीवन क्यों बर्बाद करूं। कुछ महिला संस्था से राय ली। उसके बाद पार्लर का कोर्स किया और काम शुरू किया। अपने पैसों से ही अपना केस लड़ रही हूं। कोर्ट में भी कई बार पति मिले और मेरे साथ मारपीट की कोशिश की। दो सालों से अलग रहकर पार्लर चलाती हूं। - एकता, गल्ला मंडी, कानपुर      


दो बार जान देने की कोशिश, अब जीवन संवारा 

पिता की मौत हुई थी तब बहुत छोटी थी। उसके बाद मेरे भाइयों और मां को न जाने क्यों मैं बुरी लगने लगी। मेरे साथ जुल्मों की सारी हदें पार कर दी गई। मेरे भाई मुझे बहुत मारते-पीटते थे। पुलिस तक शिकायत पहुंची तो मेरे ऊपर गलत आरोप लगाए। जीवन को खत्म करने के लिए ट्रेन के आगे कूदी लेकिन किसी ने बचा लिया। नहर में कूदी तो फिर बच गई। अब दो वर्षों से अलग किराए पर कमरा लेकर रह रहीं हूं। अपने आप पढ़ाई शुरू की है। अब बुटीक चलाती हूं। लड़कियों को भी ट्रेनिंग देती हूं। - फिरदौस, बाकरगंज
    
 
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