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शहर की मैरीकॉम बना रही पतंग

Thu, 03 Sep 2015 02:04 AM IST
ब्यूरो, ओपी वाधवानी कानपुर
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विशाखापट्टनम में बाक्सिंग के इंडिया लेवल कैंप में दर्जनों खिलाड़ी प्रैक्टिस कर रहे थे और एक लड़की मैदान में सकुचाई सी, आंखों में आंसू लिए खड़ी सबको देख रही थी।
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सब खिलाड़ी महंगे ट्रैक सूट, महंगे जूते, महंगी किट लिए उछल कूद मचाए थे और वो लड़की अपने पैरों के फटे जूते छिपाने की कोशिश कर रही थी। उसका 300 रुपये कीमत का जूता दो रनिंग में ही फट गया था। कोच से समस्या बताई तो वे उसे पास के शोरूम में ले गए। उसके नाप का जूता पहनाया लेकिन फिट आने के बाद भी उसने कह दिया कि जूता टाइट है।

क्योंकि जूता तीन हजार रुपये का था और उसकी जेब में सात सौ रुपये ही थे। झूठ बोलकर कि कोई जूता फिट नहीं आ रहा, वह शोरूम से चली आई और फिर एक जूनियर के हाथ-पैर जोड़कर जूता उधार लेकर प्रैक्टिस की। वह क्वालिफाई नहीं कर पाई।
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10 नेशनल बाक्सिंग चैंपियनशिप और 12 स्टेट चैंपियनशिप में हिस्सा लेकर कई गोल्ड सहित ढेरों पदक जीत चुकी कानपुर के मछरिया मोहल्ले की रुक्सार बानो (19) आज तक तीन हजार का जूता नहीं ले पाई हैं। पैसों की इस कदर तंगी है कि खुद और पूरा परिवार दिनभर पतंग बनाता है और 10 घंटे में मात्र 80 रुपये कमा पाता है।

रुक्सार ने ग्लब्स उतारकर पतंग पकड़ ली है, 2014 से किसी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले पाई। अक्तूबर में फिर चैंपियनशिप है पर प्रैक्टिस को दिल्ली जाने तक के पैसे नहीं। भर्राए गले से पूछती है खिलाड़ियों के अच्छे दिन कब आएंगे।

लैपटॉप बेचकर दिल्ली गई फिर हिम्मत टूट गई
कानपुर। जैसे-तैसे फतेहपुर के एक प्राइवेट कॉलेज से इंटर कर रही पांच बार बेस्ट बॉक्सर का खिताब जीत चुकी रुक्सार उस निम्नवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती है जहां खेल-खिलाड़ी के लिए सोचना भी दूभर है।

2006 में जब केके गर्ल्स कालेज कानपुर में पढ़ती थी तो एक दिन बाक्सिंग के कोच संजीव दीक्षित कुछ बच्चों को बाक्सिंग सिखाने आए, तब पहली बार एक-दो मुक्के चलाए।

कोच ने भांप लिया और हौसला बढ़ाया। कई बार कहने पर बाक्सिंग सीखने लगी। कोच ने कोई फीस नहीं ली, उल्टा अपनी जेब से मदद करने लगे तो रुखसार के मुक्कों में दम आने लगा।

साइकिल भी खरीद कर दी। 2006 में ग्रीनपार्क में स्टेट ट्रायल में मौका मिल गया लेकिन खान-पान दुरुस्त नहीं था तो अंडर वेट रह गई। फिर भी मौका मिल गया और बुलंदशहर में हुई प्रतियोगिता में 40-42 किलो भारवर्ग में गोल्ड मेडल जीत लिया।

रुक्सार बताती है कि थोड़ी शोहरत तो मिली लेकिन घर वाले बिफर गए। फिर भी चोरी-छिपे स्कूल में और ग्रीनपार्क में जाकर प्रैक्टिस करती रही। पटियाला में नेशनल खेलकर कांस्य जीत लाई और फिर घर के पते पर 10,000 की चेक आई तो अब्बू हत्थे से उखड़ गए। मोहल्ले वालों ने बहुत समझाया तो माने।

2014 कामनवेल्थ गेम्स के लिए चुन ली गई पर दिल्ली ट्रायल में जाने के लिए पैसे नहीं थे तो छोटे भाई को मिला लैपटॉप बेचना पड़ा। क्या-क्या बेचती? यह सोचकर 2014 में बाक्सिंग ग्लब्स उतार कर रख दिए।

अम्मी, बहन के साथ मिलकर दिनभर पतंग बनाती है। 1000 पतंग बनाने में 40 रुपये कमाई होती है। ग्लब्स देखकर बार-बार रोती है पर आंसू नीचे नहीं गिरने देती कि कहीं पतंग भीगकर खराब न हो जाए। कहती है, शासन-प्रशासन, सरकार, स्कूल-कालेज, कहीं से मदद नहीं मिली।

एक दिन की सिर्फ उसकी ही डाइट करीब 300 रुपये की होनी चाहिए पर पूरा परिवार मिलकर 80 रुपये कमा पाता है। एक बार मैरीकॉम से मिली थी, बहुत मन है कि मैरीकॉम जैसा बनूं पर कैसे।

राज्य प्रतियोगिताएं
12 राज्य प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। 2006-लखनऊ-बुलंदशहर में गोल्ड मेडल, 2007-गाजियाबाद-मुरादाबाद में गोल्ड, 2008 लखनऊ, 2009 बुलंदशहर-कानपुर, 2011-बुलंदशहर और लखनऊ में गोल्ड मेडल, 2012 झांसी और 2013 मुजफ्फरनगर में गोल्ड जीता।
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नेशनल चैंपियनशिप
10 नेशनल चैंपियनशिप खेलीं। 2006 पटियाला में कांस्य, 2007 काकीनाणा कांस्य, 2009 पटना  कांस्य, 2012 पटियाला कांस्य, 2010 इरोड में कांस्य जीते।

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