सोमवार की छापेमारी ने खोली बाबू-दलाल गठजोड़ की परतें
फाइलों से लेकर कैश तक जांच के घेरे में
माई सिटी रिपोर्टर
कानपुर। आरटीओ कार्यालय में सोमवार को हुई एसओजी की कार्रवाई ने वर्षों से चले आ रहे बाबू-दलाल गठजोड़ और वसूली के नेटवर्क पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। वाहन स्वामियों के काम के लिए कार्यालय के बाहर सक्रिय दलाल और अंदर बैठे बाबू मिलकर फाइलों का रास्ता तय करते थे। काम के हिसाब से रकम पहले से तय रहती थी और बिना भुगतान फाइल में आपत्ति लगाकर आवेदक को चक्कर कटवाने का खेल चलता था।
आरटीओ में करीब दो दर्जन बाबू अलग-अलग पटलों पर तैनात हैं। लंबे समय से एक ही पटल पर जमे रहने के कारण कई बाबुओं के दलालों के साथ मजबूत नेटवर्क है। वाहन स्वामी की फाइल किस बाबू के पास जाएगी, कितनी रकम लगेगी और काम कितने समय में होगा इसकी जानकारी दलालों के पास रहती थी।इसके लिए रेट भी तय है। जैसे व्यावसायिक वाहन की फिटनेस के नाम पर प्रति वाहन 4 हजार से 5 हजार रुपये, परमानेंट लाइसेंस के लिए 6 हजार, परमिट के लिए 2,000 रुपये, इसी तरह व्यावसायिक वाहन की एनओसी के लिए 2,500 रुपये, वाहन सत्यापन के लिए 1,200 रुपये और बाहर से ट्रांसफर होकर आए वाहन के पुन: पंजीकरण के लिए 1,200 रुपये लिए जाते है। सबसे बड़ा खेल पुराने परमिट पर नई गाड़ी के पंजीकरण में होता है, इसमें 20 हजार रुपये तक की रकम तय थी। वहीं टैक्स की पेनाल्टी कम कराने के नाम पर 2,000 से 3,000 रुपये तक लिए जाते है।
बाहर छाते के नीचे ‘दफ्तर’, अंदर बाबुओं तक सीधी पहुंच
आरटीओ कार्यालय के बाहर दलालों का नेटवर्क इस व्यवस्था की अहम कड़ी है। सड़क किनारे छाते के नीचे लैपटॉप, प्रिंटर और फोटो कॉपी मशीन लगाकर बैठे दलाल वाहन स्वामियों से काम लेने और फाइल तैयार कराने का काम करते थे। दलाल वाहन स्वामी से एकमुश्त रकम लेते और फिर फाइल को संबंधित बाबू तक पहुंचाकर काम कराने की जिम्मेदारी लेते। कौन-सी फाइल किस पटल पर जाएगी और किस स्तर पर कितना भुगतान करना होगा, इसकी जानकारी इन्हीं के जरिए आगे बढ़ती थी।
अब जांच की जद में पूरा सिस्टम
सारथी भवन में स्क्रूटनी काउंटरों की जांच और ऑपरेटरों से पूछताछ के बाद करीब चार घंटे चली कार्रवाई समाप्त हुई। पकड़े गए संदिग्ध दलालों को काकादेव थाने ले जाया गया। वंही अब जाँच के दायरे मे पूरा सिस्टम आ गया है।