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UP: खत्म हो गया कानपुर का अंतिम बड़ा उद्योग, KFCL को प्रबंधन ने किया बंद...हजारों लोगों को मिलता था रोजगार

Sat, 05 Apr 2025 01:26 PM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: एटक के सचिव असित कुमार सिंह ने बताया कि अचानक बंदी करना श्रम कानूनों का उल्लंघन है। बंदी की सूचना श्रम विभाग तक को नहीं दी गई। प्लांट में एक हजार से ज्यादा तकनीशियन, इंजीनियर को हटाया जा चुका है। 1300-1400 कर्मचारी ही बचे थे। उनके सामने भी रोजी-रोटी का संकट हो गया है।
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जेके कॉटन - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कानपुर शहर के औद्योगिक स्वरूप को वापस लाने के लिए सरकारें और जनप्रतिनिधि तमाम बातें करते हैं लेकिन शहर से एक के बाद एक बड़े उद्योग खत्म होते जा रहे हैं। 1500 करोड़ की लागत से 13 साल पहले पुनर्जीवित की गई कानपुर फर्टिलाइजर एंड केमिकल्स लिमिटेड (केएफसीएल) को प्रबंधन ने बंद कर दिया है। ये शहर का आखिरी बड़ा उद्योग था, जिसमें हजारों लोगों को एक साथ रोजगार दिया जाता था।

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24 मार्च 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने कानपुर को जिला पोषित किया था। समय बीता और कानपुर एक औद्योगिक नगरी के तौर पर विकसित होने लगा। ब्रिटिश इंडिया कॉरपोरेशन (बीआईसी) और नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन (एनटीसी) के अधीन लाल इमली, म्योर मिल, एल्गिन मिल एक और दो, कानपुर टैक्सटाइल, लक्ष्मी रतन कॉटन मिल, अथर्टन मिल, विक्टोरिया मिल, स्वदेशी कॉटन मिल की नींव पड़ी।

लाल इमली बंदी के कगार पर खड़ी
इन मिलों के उत्पादों ने धूम मचाई। मैनचेस्टर ऑफ द ईस्ट कहे जाने वाले शहर को इन मिलों में तीन पालियों में कपड़ों का उत्पादन होता था। तीन पाली में एक मिल में लगभग चार से पांच हजार मजदूर काम करते थे। इसके अलावा निजी क्षेत्र की जेके कॉटन, जेके जूट मिल में 10 हजार से ज्यादा लोग काम करते थे। विश्व प्रसिद्ध लाल इमली बंदी के कगार पर खड़ी है।

एलएमएल की फैक्टरी - फोटो : amar ujala
सिमट रहा है होजरी उद्योग
यहां पर बचे 150 से ज्यादा श्रमिकों का बकाया भुगतान की प्रक्रिया चल रही है। एनटीसी की मिलें पहले ही बंद हो चुकी हैं। श्रमिक नेता राजेश कुमार शुक्ला और असित सिंह ने बताया कि केएफसीएल निजी क्षेत्र की बड़ी इकाई थी जो हजारों लोगों को रोजगार दे रही थी। शहर में बड़े उद्योग बचे नहीं हैं। जो चल रहे थे, उन्हें भी बंद करने पर मजबूर होना पड़ा। शहर की एक बड़ी इस्पात कंपनी भी घाटे में चल रही है। होजरी उद्योग भी सिमट रहा है।

गेल को दिए जा चुके 17 हजार करोड़, फिर भी गैस आपूर्ति बंद की
1967 में कमीशन हुआ पनकी स्थित फर्टिलाइजर प्लांट (आईईएल) और डंकन के समय की बंदी झेल चुका है। जेपी ग्रुप ने करीब 10 साल से बंद प्लांट को 2012 से 2015 के बीच 1500 करोड़ लगाकर पुनर्जीवित किया था। उस समय जेपी प्रबंधन ने श्रमिकों और कर्मचारियों का लगभग 90 करोड़ का बकाया भुगतान किया और फीड स्टाक को नाप्था से नैचुरल गैस में परिवर्तित किया। पिछले 10 सालों से यह प्लांट अपनी क्षमता के 90 फीसदी से ज्यादा का उत्पादन कर रहा है।

जेके जूट मिल - फोटो : amar ujala
केएफसीएल का नैनो यूरिया प्लांट निर्माणाधीन
किसानों को बड़े पैमाने पर यूरिया की बिक्री साल में दो बार रबी और खरीफ के समय होती है। यूरिया के उत्पादन के लिए गैस की खपत लगातार पूरे साल लगभग एकसमान होती है। अबतक केएफसीएल ने गेल को लगभग 17,000 करोड़ रुपये का भुगतान किया है, जिसमें करीब 250 करोड़ रुपये का ब्याज भी शामिल है। इसके बाद भी 18 दिसंबर को गेल ने प्लांट की गैस पूरी तरह से बंद कर दी। बताया गया कि प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत और नैनो यूरिया के उपयोग के आह्वान के तहत केएफसीएल का नैनो यूरिया प्लांट निर्माणाधीन है। इसके बाद भी प्लांट को बंद करना पड़ा।

इन कारणों से बंद हो गया केएफसीएल
  • केंद्र सरकार की नीति अनुसार सब्सिडी के एनर्जी मानक को 31 मार्च 2025 के बाद केएफसीएल के लिए नवीनीकरण नहीं किया गया है।
  • पिछले 10 वर्षों से केएफसीएल की तय लागत जो कि 3326 रुपये प्रतिटन यूरिया है को बढ़ाया नहीं गया है। मुद्रा स्फीति के आधार पर वर्ष 2013 से अब तक लागत में 92 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके चलते कंपनी पर पिछले एक साल में ही 200 करोड़ का असर पड़ा है।
  • केएफसीएल को कार्य करने के लिए पूंजी में से गेल और केस्को के अनुचित व्यवहार के कारण पिछले तीन महीने ही 200 करोड़ से अधिक निकालने पर मजबूर किया गया।
  • गेल से गैस न मिलने और और केस्को के बिजली काटने की प्रक्रिया के कारण 100 करोड़ से अधिक का आर्थिक नुकसान हुआ है।

लाल इमली मिल - फोटो : amar ujala
अचानक बंदी करना श्रम कानूनों का उल्लंघन है। बंदी की सूचना श्रम विभाग तक को नहीं दी गई। प्लांट में एक हजार से ज्यादा तकनीशियन, इंजीनियर को हटाया जा चुका है। 1300-1400 कर्मचारी ही बचे थे। उनके सामने भी रोजी-रोटी का संकट हो गया है। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से सात हजार से ज्यादा लोगों के सामने परेशानी आ गई है।  -असित कुमार सिंह, सचिव, एटक
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मिलें जो बंद हो गईं
  • 14 मई 1989 को सबसे पहले शहर में जेके कॉटन मिल को बंद किया गया था। रात में बंदी का नोटिस चस्पा किया गया था। मिल में तीन पालियों में 3500 श्रमिक काम करते थे।
  • जेके जूट मिल सबसे पहले 1993 में बंद की गई थी। इसके बाद मिल में कुछ साल बंदी रही। फिर सारडा समूह ने मिल चलाने का प्रयास किया। कुछ साल मिल चलती रही। फिर 2013 से यहां पर काम पूरी तरह बंद हो गया। मिल में 3000 श्रमिक काम करते थे।
  • 2006 में एलएमएल बंद हो गई। एलएमएल में चार हजार श्रमिक काम करते थे।
  • 2002 में एनटीसी समूह की कंपनी लक्ष्मी रतन मिल को सबसे पहले बंद किया गया।
  • 2003 में म्योर मिल, स्वदेशी कॉटन, अर्थटन और विक्टोरिया मिल को बंद कर दिया गया।
  • एनटीसी की इन मिलों में 25-30 हजार से ज्यादा श्रमिकों को काम मिलता था।
  • 2005 में बीआईसी के अधीन संचालित कानपुर टेक्सटाइल को रात 12 बजे बंद कर दिया गया।
  • 2006 में एल्गिन मिल एक और एल्गिन मिल को बंद कर दिया गया। बीआईसी की इन तीन मिलों में पांच हजार लोगों को रोजगार मिलता था।
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