वन अनुसंधान संस्थान में लगी बांस की प्रजाति
- फोटो : amar ujala
बड़े काम का बांस
वन अनुसंधान संस्थान के प्रभारी क्षेत्रीय वन अधिकारी अमित कुमार वर्मा ने बताया कि बांस के पौधे वायु प्रदूषण को कम करने और मिट्टी के कटाव को रोकने में मदद करते हैं। निर्माण कार्यों में मचान, गांवों में घर और झोपड़ियां, घरों और होटलों में फर्नीचर, विभाजन पैनल, टोकरी, पंखे, अन्य सजावटी वस्तुओं और मेलों में पंडाल, बैरीकेडिंग को बनाने के लिए बांस का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के लिए अर्थी बनाने में बांस का उपयोग किया जाता है। शहर में अगरबत्ती बनाने के लिए बांस की छड़ें एक महत्वपूर्ण कच्चा माल हैं। यहां से कन्नौज तक इनकी सप्लाई होती है। शहर की बांस मंडी इन सभी कार्यों के लिए बांस की आपूर्ति का एक प्रमुख केंद्र है।
वन अनुसंधान संस्थान में लगी बांस की प्रजाति
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किसानों का भी करें जागरूक
जनपद में बांस का रोपण काफी लोकप्रिय हो रहा है। प्रदेश में राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत 37 जिलों में बांस की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके लिए सरकार और संस्थानों द्वारा प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें कानपुर भी शामिल है। जीटी रोड स्थित राज्य वन अनुसंधान संस्थान (एफआरआई) के निदेशक अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक लाख बांस के पौधे तैयार किए हैं। ये पौधे शहर के विभिन्न हिस्सों में लगाए जा रहे हैं। जनपद के किसानों को भी बांस की खेती के लिए जागरूक किया जा रहा है।