स्टील का वॉल्व ट्रांसप्लांट करने पर रहता है रिस्क
उन्होंने बताया कि पशुओं की झिल्ली से बने इस वॉल्व की उम्र 15 साल की होती है। 65-70 की उम्र के रोगी को प्रत्यारोपित करने पर उसे 80-85 साल की उम्र तक दिक्कत नहीं होती। ओपन हार्ट सर्जरी करके स्टील का वॉल्व ट्रांसप्लांट करने पर रिस्क रहता है। इस उम्र में डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, गुर्दा, लिवर आदि भी हो जाते हैं। इससे जटिलताएं बहुत अधिक बढ़ती हैं। यह विधि सुरक्षित है। इसमें सर्जरी नहीं करनी पड़ती। नस के अंदर से हृदय के वॉल्व तक पहुंचा जाता है। प्रोफेसर शर्मा ने बताया कि हृदय के वॉल्व में सिकुड़न आने पर रोगी चक्कर, सीने में दर्द, सांस में तकलीफ आदि लक्षण लेकर आते हैं।
विशेषज्ञ टीम लेती है निर्णय
तवी विधि से रोगी के इलाज के पहले विशेषज्ञ टीम इस संबंध में फैसला लेती है। इस टीम में एक कार्डियोलॉजिस्ट, एक कार्डियक सर्जन और एक कार्डियक एनेस्थेटिस्ट होता है। इन तीनों के एक राय होने पर ही रोगी को इलाज दिया जाता है। जिस संस्थान में ये तीनों विशेषज्ञ होते हैं, वहीं यह इलाज संभव है।
जर्मन विशेषज्ञ की खोज है तवी विधि
तवी विधि ने जर्मन विशेषज्ञ एलेन क्रीबियर ने शुरू की। उन्होंने वर्ष 1990 से इस पर काम शुरू किया और वर्ष 2002 में पहली बार इसका इस्तेमाल किया। वर्ष 2010 में भारत में पहली बार एक 80 साल की महिला हृदय रोगी का इस विधि से इलाज किया गया। इस समय देश के 30 हार्ट सेंटरों पर इस विधि का इस्तेमाल किया जा रहा है।