चमड़ा उद्योग के रूप में कानपुर को पहचान दिलाने वाली टेनरियां पिछले करीब पांच महीने से ताले में बंद हैं। सरकारी आदेश के इंतजार में टेनरी संचालक और चमड़ा कारोबार से जुड़े शहर के दो लाख से अधिक लोग परेशान हैं।
प्रदेश सरकार की योजना एक जिला एक उत्पाद के तहत कानपुर को चमड़ा उद्योग से भी जोड़ा गया है। इन सब के बावजूद इस बार के लोकसभा चुनाव में चमड़ा उद्योग और बंद टेनरियां मुद्दा नहीं बन पाईं हैं। सालाना 15 हजार करोड़ का कारोबार करने वाला चमड़ा उद्योग इस चुनाव में अलग-थलग पड़ा है।
बंद टेनरियों की फाइल कभी शासन के पास तो कभी मुख्यमंत्री कार्यालय में घूम रही है। इधर टेनरियों में काम करने वाले एक लाख मजदूर तबके के लोग धीरे-धीरे दूसरी रोजी की तलाश में इधर-उधर भटकने लगे हैं। टेनरी संचालकों को हर तीसरे दिन लखनऊ बुलाकर उनसे गंगा को दूषित नहीं करने का शपथपत्र भराया जाता है, लेकिन टेनरियां कब खुलेंगी, इसका कोई सही जवाब उन्हें नहीं मिलता है।
मजे की बात है कि चमड़ा कारोबार से जुड़े ज्यादातर लोग किसी विशेष समुदाय से आते हैं, ऐसे लोगों को अपना हितैषी बताने वाली पार्टियां भी इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहीं। उनके चुनावी एजेंडे में टेनरियों की बंदी खुलवाने का मु्द्दा नहीं रखा गया है। सोमवार को भी टेनरी संचालकों को पर्यावरण मंत्रालय की तरफ से लखनऊ बुलाया गया था, लेकिन शाम को सभी को बैरंग लौटा दिया गया।
7000 हजार करोड़ का हो चुका है नुकसान
पिछले करीब पांच महीने से बंद पड़ी टेनरियों की वजह से चमड़ा कारोबार को अब तक सात हजार करोड़ का नुकसान हो चुका है। बाहर से मिलने वाले सभी आर्डर बंद हो चुके हैं। टेनर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि शहर से चमड़ा कारोबार को जानबूझकर खतम किया जा रहा है।
लंबे समय से टेनरियां बंद होने से कई ट्रक रॉ हाइड (कच्चा चमड़ा) गड्डा खोदकर जमीन में गाड़ना पड़ा है। चमड़े के कारोबार में लगे मजदूरों की बड़ी संख्या धीरे-धीरे चमड़े का काम छोड़कर कुछ और करने के लिए शहर से बाहर जा रही है।
- डॉ. फिरोज आलम, वरिष्ठ पदाधिकारी स्माल टेनर्स एसोसिएशन