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Kanpur: इंटर में 72% नंबर आने पर छात्रा ने दी जान, पिता बोले- कम नंबर आने से थी दुखी, पुलिस को नहीं जानकारी

Sat, 26 Apr 2025 10:04 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: सजेती के असधना गांव में इंटर में 72 फीसदी नंबर आने पर भी छात्रा ने जान दे दी। पिता ने बताया कि कम नंबर आने से दुखी थी। पुलिस को कोई सूचना नहीं मिली है।
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डॉ. धनंजय चौधरी और डॉ. सीमा नाहिद - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कानपुर में सजेती थाना क्षेत्र के असधना गांव निवासी इंटर की छात्रा ने 72 फीसदी अंक आने पर शुक्रवार को जान दे दी। परिजनों का कहना है कि उसे ज्यादा नंबर आने की उम्मीद थी। असधना गांव निवासी दिलीप सचान खेती करते हैं। उनकी बेटी प्राची (18) फतेहपुर के जहानाबाद स्थित एक कॉलेज में इंटर की छात्रा थी। शुक्रवार को परीक्षा परिणाम आया। इसमें प्राची 72 फीसदी नंबर से पास हुई।

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पिता दिलीप का कहना है कि उसे उम्मीद से कम अंक मिले। इससे वह दुखी हो गई। शाम को उसने जहरीला पदार्थ खा लिया। हालत बिगड़ने पर जानकारी हुई, तो उसे जहानाबाद सीएचसी लेकर पहुंचे। वहां उसने दम तोड़ दिया। परिजन छात्रा का शव लेकर घर आ गए। छात्रा का छोटा भाई आशु कक्षा आठ का छात्र है। थाना प्रभारी कमलेश राय ने बताया कि अभी ऐसी कोई सूचना नहीं मिली है। परिजनों ने भी जानकारी नहीं दी है।

बच्चों को अंकों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। यह सिर्फ नंबर हैं। असफलता ही सफलता की कुंजी है। माता-पिता से बात करें। सफलता की कुंजी अंक नहीं होते हैं। सफल होने का पैमाने और भी कई हैं। कम नंबर आने पर आत्महत्या जैसा कदम उठाना गलत है। माता-पिता बच्चों को हतोत्साहित नहीं प्रोत्साहित करें। उनसे कहें कि वे पढ़ाई करें। परीक्षा परिणामों पर ध्यान न दें। हमारे जमाने में 75 प्रतिशत अंक बहुत थे। बच्चों के हिसाब से आज 99 प्रतिशत भी कुछ नहीं हैं। इसलिए अभिभावक बताएं कि तुम कम नंबर भी लाओगे तो हमारा प्यार कम नहीं होगा।  -डॉ. धनंजय चौधरी, विभागाध्यक्ष मनोरोग विभाग, जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज
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बच्चों को संतुष्टि नहीं है। बच्चों पर प्रेशर भी बहुत रहता है कि 90 प्रतिशत से ज्यादा अंक आने चाहिए। इसमें माता-पिता को समझना होगा कि हर बच्चे की क्षमता अलग होती है। इसलिए आपका बच्चा अगर कम नंबर भी ला रहा है तो जरूरी नहीं है कि वो कामयाब नहीं है। पहले माता-पिता खुद समझें कि अंक जरूरी नहीं हैं। उसके बाद वो अपने बच्चे को समझाएं। हर वक्त पढ़ाई-पढ़ाई में आईसोलेट करके न रखें। उन्हें खेलने भी दें और चीजों में भी शामिल करें।  -डॉ. सीमा नाहिद, काउंसलिंग साइकोलॉजिस्ट
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