साक्ष्य थे, नजरअंदाज किया गया था
जिस तरह एसआईटी ने करीब चार दशक बाद मामले में वादी, गवाह, साक्ष्य और आरोपियों का पता कर लिया। उससे एक बात तो स्पष्ट है कि उस वक्त इन सभी चीजों को नजरअंदाज कर दिया गया था। इससे आरोपियों को लाभ मिल सके। यही हुआ भी और आशंका है कि साजिश के तहत यह सब किया गया। वरना जब तीन दशक बाद सुबूत मिल सकते हैं, तो घटना के बाद सुबूत न मिलना गले नहीं उतर रहा है।
आयोग की रिपोर्ट आई काम
दंगों के बाद जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने जांच की थी। एसआईटी ने गृह मंत्रालय की अनुमति लेकर आयोग से कानपुर दंगों संबंधी दस्तावेज जुटाए थे, जिसमें सवा सौ से अधिक शपथ मिले थे। इसमें से एसआईटी को वादी, गवाहों और आरोपियों के नाम व पते मिल गए थे। इस वजह से एसआईटी को विवेचना में काफी आसानी रही।