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दरकते रिश्ते: शरई अदालत में हर महीने आ रहे 30 मामले, नफका व तलाक के केसों से चिंता, काउंसलिंग से करा रहे फैसले

Thu, 24 Sep 2026 10:16 AM IST
Himanshu Awasthi हुमा आलम, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: शहर में पारिवारिक विवाद, तलाक और महिलाओं व बच्चों के भरण-पोषण से जुड़े मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। सुन्नी दारुलकजा और मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा के आंकड़ों के मुताबिक, हर महीने औसतन 30 मामले शरई अदालतों में पहुंच रहे हैं। 
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सांकेतिक - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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कानपुर में तलाक, रिश्तों में दरार और महिलाओं और बच्चों के भरण-पोषण (नफका) से जुड़े मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अपने और मासूम बच्चों के हक के लिए महिलाएं शरई अदालत का दरवाजा खटखटा रही हैं। सुन्नी दारुलकजा, मोहकमा-ए-शरिया दारुलकजा व काउंसलिंग सेटंर्स से मिले आंकड़ों के अनुसार शहर में हर महीने औसतन 30 ऐसे मामले शरई अदालत पहुंच रहे हैं। कई मामलों में तो पतियों ने इद्दत की अवधि के दौरान भी पत्नी का जायज खर्च नहीं उठाया। शरई अदालत में काजी और काउंसलर्स दोनों पक्षों को बुलाकर शरीअत के मुताबिक फैसला कराने की कोशिश कर रहे हैं।

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केस-1: जाजमऊ निवासी महिला का पति से विवाद के बाद तलाक हो गया। शरीअत के मुताबिक इद्दत की तीन महीने की अवधि के दौरान पत्नी को नफका (भोजन, कपड़े व रहने का खर्च) देना अनिवार्य होता है लेकिन पति ने महिला को एक रुपया तक नहीं दिया। मजबूरी में महिला को शरई अदालत जाना पड़ा, जहां उलेमाओं ने पति को इद्दत का पूरा खर्च चुकाने का सख्त आदेश दिया।

केस-2: पति से अनबन के बाद चमनगंज की महिला दो छोटे बच्चों के साथ आठ महीने से अपने मायके में है। इस दौरान पति ने न तो उसका हालचाल लिया, न ही बच्चों की पढ़ाई व दूध-दवा के लिए कोई रकम भेजी। महिला ने शरई अदालत में अर्जी देकर मांग की है कि पति पर बच्चों की परवरिश की आर्थिक जिम्मेदारी तय की जाए।

केस-3: पहली पत्नी और बच्ची को छोड़ा बेसहारा बाबूपुरवा के रहने वाले एक शख्स ने पहली पत्नी को बिना बताए दूसरी शादी कर ली। पहली पत्नी और चार साल की बेटी को बेघर कर दिया। बेटी की स्कूल फीस तक देने को तैयार नहीं है। शरई अदालत ने पति को तलब किया है, ताकि बच्ची के भविष्य के नफके का उचित फैसला हो सके।

पुरुषों में जिम्मेदारी से भागने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। शरीअत में पत्नी और बच्चों का नफका देना पति का फर्ज माना गया है। इसके बावजूद महिलाओं को अपने ही हक के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ रही है।  -कारी सगीर आलम हबीबी, नायब शहर काजी सुन्नी दारुलकजा रजबी रोड
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शरई अदालत ऐसे मामलों में आपसी सहमति और काउंसलिंग के जरिए महिलाओं को हक दिलाने का प्रयास किया जाता है। इस तरह के मामले हर महीने आ रहे हैं, जिसमें आपसी सहमति से निपटारा कराया जाता है।  -मुफ्ती अब्दुल रशीद, अध्यक्ष दारुलकजा
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