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लॉकडाउन में प्रदूषण घटा, अप्रैल में नहीं सता पाई उमस वाली गर्मी, न्यूनतम तापमान पांच डिग्री कम

Sat, 02 May 2020 12:01 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर
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लॉकडाउन में साफ हुई हवा - फोटो : amar ujala
कानपुर में कोरोना के चलते लॉकडाउन से मौसम में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ओर से जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि इस बार वातावरण में प्रदूषण के कणों की मात्रा पूरी तरह समाप्त हो जाने से अप्रैल माह तक उमस महसूस नहीं की गई। ऐसा गर्मी के मौसम में पहली बार हुआ है। वातावरण में मौजूद नमी प्रदूषित कणों से मिलकर एक परत के रूप में जमा हो जाती है।
 
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प्रदूषण से मिली राहत - फोटो : amar ujala
जिससे जमीन की ऊर्जा आसमान में जाने के बजाय जमीन से करीब तीन किलोमीटर ऊपर ही जमा रहती है। इससे वातावरण में उमस जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन इस बार वातावरण में प्रदूषण की मात्रा पिछले करीब एक महीने से पूरी तरह खत्म है। यही वजह है कि अभी तक लोगों को उमस भरी गर्मी नहीं सता पाई है। 

 
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मौसम हुआ साफ - फोटो : amar ujala
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (सीएसए) स्थित मौसम इकाई के अनुसार वर्ष 2017, 2018 एवं 2019 की तुलना में इस वर्ष अप्रैल महीने में न्यूनतम तापमान में करीब पांच डिग्री सेल्सियस तक की गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2017 के अप्रैल महीने में सबसे न्यूनतम तापमान 16.6 डिग्री सेल्सियस, 2018 में 18.6 डिग्री सेल्सियस व वर्ष 2019 के अप्रैल में सबसे न्यूनतम तापमान 16 डिग्री सेल्सियस रिकार्ड हुआ था। जबकि इस बार 2020 के अप्रैल महीने में सबसे न्यूनतम तापमान 13.8 डिग्री सेल्सियस रहा।

 
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मौसम से लोगों को मिली राहत - फोटो : amar ujala
इसकी वजह यह है कि प्रदूषण मुक्त वातावरण में जमीन से उठने वाली ऊर्जा आसानी से ऊपर निकल जा रही है। जिससे जमीन का वातावरण ठंडा महसूस रहा है। स्थानीय मौसम विभाग के निदेशक डॉ. नौशाद खान ने बताया कि प्रदूषण न होने की वजह से दिन के समय सूर्य की किरणें सीधे जमीन पर आ रही हैं। इससे धूप तो तेज हो रही है लेकिन नमी और प्रदूषण के बीच कोई संबंध नहीं होने से उमस भरी गर्मी नहीं पड़ रही है। यही वजह है कि वातावरण काफी अच्छा और हल्का महसूस हो रहा है।

लॉकडाउन के दौरान वातावरण में नाइट्रोजन ऑक्साइड, सोडियम ऑक्साइड जैसे हानिकारक प्रदूषित कण न पाए जाने की सबसे बड़ी वजह वाहनों का नहीं चलना है। वाहनों से धुएं के रूप में कॉर्बन कण निकलते हैं। साथ ही गड्ढायुक्त सड़कों से लगातार उठने वाली धूल से भी वातावरण में प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है। जो इस समय पूरी तरह गायब है।
डॉ. एसबी फ्रैंकलिन, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण अधिकारी

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