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UP: कभी कर्ज चुकाने के नहीं थे पैसे अब 1,050 करोड़ का है कारोबार; हर दिन 300 KM का सफर; किसान के बेटे का कमाल

Mon, 28 Jul 2025 03:25 PM IST
शाहरुख खान शैलेश अरोड़ा, अमर उजाला, कानपुर

सार

कभी कर्ज चुकाने के पैसे नहीं थे। अब 1,050 करोड़ का कारोबार है। किसान के बेटे ने कमाल कर दिखाया। कपिला पशु आहार तीन दशक में प्रतिदिन 50 से 2,500 टन उत्पादन तक पहुंच गया है।
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सुरेंद्र शिवहरे - फोटो : संवाद
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विस्तार
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बुंदेलखंड के एक किसान ने बेटे को पोस्ट ग्रेजुएशन तक पढ़ाई कराई। बस यही सपना था कि बेटा पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी में लग जाए। लेकिन, बेटे ने तो कुछ और ही सोच रखा था। 1986 में पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद बेटे ने खुद का व्यवसाय करने की सोची। 
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कर्ज लेकर काम शुरू किया। तमाम चुनौतियों का सामना करते हुए जिस कंपनी को खड़ा किया, आज उसका टर्नओवर करीब 1,050 करोड़ रुपये पहुंच गया है। सफलता की यह कहानी है...कपिला पशु आहार बनाने वाली कंपनी कामधेनु कैटल फीड प्राइवेट लि. के एमडी सुरेंद्र शिवहरे की।

हमीरपुर के भरुआ सुमेरपुर गांव के निवासी सुरेंद्र शिवहरे के पिता दिवंगत बीएल शिवहरे किसान थे। वह चाहते थे कि बेटा अच्छी सरकारी नौकरी में लग जाए। इसलिए, कभी पढ़ाई में बाधा नहीं आने दी। 
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सुरेंद्र उन दिनों को याद करते हुए कहते हैं, 1983 में वह उच्च शिक्षा के लिए कानपुर आ गए और डीएवी कॉलेज में दाखिला लिया। पढ़ाई पूरी होने के बाद सरकारी नौकरी पाना आसान नहीं था। सोचा कि इतनी मेहनत एक नौकरी के लिए करने की जगह अपने व्यापार के लिए क्यों न की जाए। 
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वह बताते हैं, किसी परिचित से पता चला कि पराग गांवों से दूध कलेक्शन के लिए गाड़ियां किराये पर लेती है। तो सुरेंद्र ने कुछ पैसा परिचितों और रिश्तेदारों से उधार लिया और बाकी फाइनेंस कराकर एक गाड़ी खरीदी। इसे पराग के साथ अटैच कर दिया। 
 

यह गाड़ी रोजाना गांवों की सोसायटी से दूध कलेक्शन करती और पराग के चिलिंग प्वॉइंट पर ले जाती। शाम को यही गाड़ी पराग से जुड़ी सोसायटी के किसानों के लिए पशु आहार लेकर जाती थी। गाड़ी जब भी पशु आहार लेकर सोसायटी पहुंचती, तो वहां ड्राइवर और स्टाफ से किसानों का झगड़ा हो जाता। वजह थी...मांग की तुलना में पशु आहार की कम आपूर्ति। यहीं से सुरेंद्र को विचार आया कि क्यों ने पशु आहार का काम शुरू किया जाए।

 

शुरू में खारिज हो गया लोन आवेदन पर कायम रहा आगे बढ़ने का जज्बा?
सुरेंद्र ने 1990 में उत्तर प्रदेश वित्तीय निगम में लोन के लिए आवेदन किया। लेकिन, जिस उत्पाद की यूनिट लगानी थी, वह प्रचलित नहीं थी, तो आवेदन खारिज हो गया। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और फिर से 30 लाख के लोन का आवेदन किया। इस बार किस्मत साथ दे गई और 27.70 लाख का लोन मिल गया। इसमें से 24 लाख बैंक से निकाले। 20 लाख फैक्टरी लगाने और चार लाख कच्चे माल पर खर्च किए।

 

हर दिन 300-300 किलोमीटर का सफर
सुरेंद्र बताते हैं, शुरू में वह प्रतिदिन 300-300 किलोमीटर गांवों और बाजारों में जाकर किसानों, पशुपालकों को पशु आहार के बारे में बताते थे। ज्यादातर पशुपालकों को इसके बारे पता नहीं था। वे पशुओं को चारा देते थे। खरीदकर पशु आहार देने की बात उनके गले नहीं उतरती थी। इतनी भागदौड़ के बाद 5 टन पशु आहार का भी ऑर्डर मिल जाता, तो सोचते थे कि चलो कुछ खर्चे निकलेंगे।

 

काफी समय तक 50 टन प्रतिदिन की क्षमता वाले प्लांट से 5-10 टन पशु आहार का उत्पादन होता रहा। पूरी क्षमता से प्लांट नहीं चला, तो हालात खराब होने लगे। यूपीएफसी से भी लोन की किस्त के लिए दबाव था। लेकिन, धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 

 

आज उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में आपूर्ति
सुरेंद्र ने 1992 में 50 टन प्रतिदिन पशु आहार बनाने की क्षमता वाली पहली फैक्टरी भरुआ सुमेरपुर में लगाई थी। आज कानपुर के रनिया औद्योगिक क्षेत्र में प्रतिदिन 2,500 टन पशु आहार बनाने की क्षमता वाली ऑटोमेटेड फैक्टरी है। वर्तमान में कपिला पशु आहार की आपूर्ति उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, ओडिशा, असम, झारखंड, जम्मू-कश्मीर, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र तक हो रही है।

 
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सफलता के लिए मेहनत और अच्छी रणनीति की जरूरत ः सफलता के लिए मेहनत, ईमानदारी और अच्छी रणनीति की जरूरत होती है। सुरेंद्र बताते हैं, उन्होंने फैक्टरी बनवाने का काम किसी ठेकेदार को नहीं दिया। एक-एक ईंट अपने सामने लगवाई। वह कहते हैं, किसान पशु आहार की बोरी पर यह नहीं पढ़ता है कि उसमें क्या मिला है। उसे तो दूध की बाल्टी से मतलब है। नतीजे मिलेंगे तो वह इस्तेमाल करेगा। पशु स्वस्थ रहें और मुनाफा बढ़े...इसलिए, हमने कीमत और गुणवत्ता का हमेशा ध्यान रखा।
 
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