परमट स्थित आनंदेश्वर मंदिर के शिवलिंग की लंबाई लगातार कम हो रही है। श्रद्धालुओं के चाभी, सिक्का, माला घिसने और केमिकल युक्त पदार्थ चढ़ाने का असर पड़ रहा है। पिछले तीन साल में शिवलिंग की लंबाई 12 एमएम कम हो गई है। यह जानकारी अप्रैल में मंदिर प्रबंधन की ओर से कराई गई जांच में सामने आई है। इससे पूर्व पुरातत्व विभाग की जांच में शिवलिंग की लंबाई पांच एमएम कम मिली थी। बाबा के कम होते आकार पर जूना अखाड़ा के पदाधिकारियों ने चिंता जताई है। भक्तों से ऐसा न करने की अपील की जा रही है।
छोटा काशी कहे जाने वाले गंगा किनारे स्थित बाबा आनंदेश्वर मंदिर में आम दिनों में करीब 50 हजार के आसपास श्रद्धालु आते हैं। सावन माह के हर सोमवार को यह संख्या करीब चार से पांच लाख और महाशिव रात्रि पर भी इतने ही भक्त दर्शन के लिए आते हैं। जूना अखाड़ा के मीडिया प्रभारी आशुतोष कुमार अंश ने बताया कि मंदिर में आने वाले अधिकतर भक्त पिंडी (शिवलिंग) को काफी देर तक रगड़ते और धार की पानी डालते हैं। कुछ भक्त सिक्के, तिजोरी व कार की चाभी और माला भी इस पर घिसते हैं। इसकी वजह से शिवलिंग की लंबाई कम हो रही है। जूना अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता नारायण गिरी महाराज, प्रेम गिरि महाराज, नारायण गिरी महाराज, उमाशंकर भारती व सभापति मोहन भारती महाराज ने इस पर चिंता जताते हुए कहा है कि भक्तों को बाबा के दर्शन-पूजन के समय सावधानी बरतनी चाहिए।
श्री हरि गिरी जी महाराज जूना अखाड़ा संरक्षक व अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद महामंत्री
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इस तरह लगाया पता
बाबा के शिवलिंग की अर्घा को 25 वर्ष से अधिक समय पहले सोने से मढ़ा गया था। उस दौरान शिविलिंग और सोने की परत बराबर थी। चारों ओर बिल्कुल भी जगह नहीं थी। अब शिवलिंग नीचे चला गया और सोने की परत ऊपर है। आसपास चावल के तीन दानों के बराबर (करीब 17 एमएम) की जगह बन गई है।
पुरातत्व विभाग की टीम ने की थी जांच
अंश ने बताया कि करीब तीन साल पहले लखनऊ से आई पुरातत्व विभाग की टीम ने मंदिर का सर्वे किया था। उस वक्त शिवलिंग की लंबाई की गई तो यह करीब पांच एमएम कम था। अब एक माह पहले मंदिर प्रबंधन ने खुद ही नाप की तो यह 17 एमएम घट चुका है। करीब 15 साल पहले जब मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया तो खोदाई के दौरान बाबा के शिवलिंग का छोर नहीं मिला था।
दिशा-निर्देश किए गए जारी
जूना अखाड़ा के संरक्षक हरि गिरि महाराज ने कहा है कि उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भी ऐसा ही हो रहा था। वहां प्रशासन की कमेटी बनाकर केमिकल युक्त पदार्थ के उपयोग पर रोक लगा दी गई। रेत से बने रामेश्वरम मंदिर को भी लोग घिसते थे। वहां भी ऐसा करने पर रोक लगा दी गई है।
- शिवलिंग पर जल की पतली धार बनाकर जलाभिषेक न करें।
- शिवलिंग पर चाभी, सिक्के और माला न घिसे।
- केमिकल युक्त पदार्थ मिलाकर बाबा को अर्पित न करे।
यह है मंदिर का इतिहास
गंगा किनारे करीब तीन एकड़ क्षेत्र में बाबा आनंदेश्वर मंदिर बना है। प्राचीन समय में यहां टीला हुआ करता था, जिसके आसपास कई गाय चरने के लिए आती थी। उन्हीं में से एक गाय आनंदी इस टीले पर एक ही स्थान पर दूध से अभिषेक करती थी। तत्कालीन राजा के दरबार में यह मुद्दा उठा तो राजा ने स्वयं जाकर देखा तो सत्यता मिली। इस पर टीले की खुदाई कराई गई। कई दिन की खुदाई के बाद उस टीले से शिवलिंग निकला, जिसे स्थापित किया गया। शिवलिंग की स्थापना के बाद से उस गाय ने भी वहां अपना दूध बहाना बंद कर दिया। उस गाय के नाम पर ही भोलेनाथ का नाम आनंदेश्वर रखा गया।