न कारोबार बढ़ाया और न ही ऋण चुकाया
विभाग ने भी इन समूहों की कोई सुध नहीं ली। सभी समूहों ने अलग-अलग चरणों में करीब 40 लाख रुपये बैंक से लिए थे। नियमानुसार समूहों को पहले रिवॉल्विंग फंड और बाद में बिना गारंटी सामुदायिक निवेश निधि दी जाती है ताकि महिलाएं स्वरोजगार शुरू कर सकें। मगर कई समूहों ने न कारोबार बढ़ाया और न ही ऋण चुकाया।
बैंक रिकवरी एजेंटों को सौंपी जिम्मेदारी
स्थिति यह हो गई कि बैंकों ने इन समूहों को नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) घोषित कर दिया। शासन ने जब जिलेवार समीक्षा की तो कानपुर में बड़ी संख्या में निष्क्रिय समूहों का मामला पकड़ में आया। अब बैंक और आजीविका मिशन की संयुक्त टीमें गांव-गांव जाकर रिकवरी अभियान चलाएंगी। ब्लॉक मिशन प्रबंधकों और बैंक रिकवरी एजेंटों को जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे महिलाओं से बकाया राशि जमा कराएं।
कई समूहों की ऋण सीमा बढ़कर 10 लाख पहुंची
जिले में वर्तमान में 6230 स्वयं सहायता समूह संचालित हैं जिनसे 65 हजार से अधिक महिलाएं जुड़ी हैं। अधिकांश समूहों ने पशुपालन, सिलाई, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य कुटीर उद्योगों के जरिये अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की है। कई समूहों की ऋण सीमा बढ़कर 10 लाख रुपये तक पहुंच चुकी है।
समूह बनने के बाद ऐसे मिलता पैसा
ब्लाॅक मिशन मैनेजर की अगुवाई में एक समूह बनाया जाता है जिसके नाम पर सरकारी बैंक में खाता खुलवाया जाता है। शुरुआती खर्च के लिए 2500 रुपये दिए जाते हैं। तीन माह सक्रिय रहने पर 15 हजार रुपये रिवाॅल्विंग फंड के नाम पर दिए जाते हैं। इससे काम का शुभारंभ करते हैं। छह माह बाद 1.10 लाख रुपये सामुदायिक निवेश निधि का दिया जाता है। इससे कारोबार को बढ़ा सकें। इसके बाद जैसे-जैसे बैंक में ऋण जमा करते जाते हैं ऋण सीमा बढ़ती जाती है।
पतारा के सबसे ज्यादा 14 समूह हुए एनपीए
जिले के पतारा ब्लाॅक के सबसे ज्यादा समूह 14 एनपीए चिह्नित हुए। भीतरगांव में नौ, चौबेपुर में सात, सरसौल में पांच, ककवन में चार, बिल्हौर में दो, घाटमपुर, शिवराजपुर, विधनू ब्लाॅक में एक-एक समूह एनपीए चिह्नित हुए।
निष्क्रिय समूहों की पहचान की गई है। बैंक और ब्लाॅक मिशन की टीमें संयुक्त रूप से रिकवरी अभियान चलाएंगी। इसके लिए सभी को नोटिस भेजने की तैयारी की जा रही है। -अलोक कुमार, उपायुक्त ग्रामीण आजीविका मिशन प्रभारी