थैरेपी के बाद रोगियों की स्थिति में सुधार हुआ
वहीं, 20 का जो उपचार चल रहा था, उसे वैसे ही चलने दिया गया। थैरेपी के बाद रोगियों की स्थिति में सुधार हुआ। रोगियों की मॉनिटरिंग की गई। छह महीने के बाद भी उनमें सुधार बना रहा। रोगियों का आयु वर्ग 22 से 45 साल के बीच रहा है। इनमें पांच महिलाएं भी थीं। रोगियों को थैरेपी के दौरान उनकी बीमारी के बारे में बताया गया। समझाया गया कि उन्हें यह दिक्कत है। समझ पैदा होने के बाद उन्हें मनोविज्ञान से संबंधित शिक्षा दी गई।
चीजों को देखने का नजरिया हो जाता है नकारात्मक
बताया गया कि घटनाओं को उसी नजरिया से लें जिस तरह वे घटित हो रही हैं। इसमें भ्रांति न हो। नजरिया दुरुस्त होने के बाद उनकी तबीयत सुधर गई। डॉ. शुक्ला का कहना है कि अक्सर मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति यह मानने के लिए तैयार ही नहीं होता है कि वह बीमार है। इससे इलाज को लेकर गंभीर नहीं होता और चिकित्सक को कोऑपरेट नहीं करता। उसे चीजों को देखने का नजरिया नकारात्मक हो जाता है। इससे समस्या और बढ़ती जाती है।