कानपुर में संजीत अपहरण कांड पर पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहा कि इस अपहरण कांड का दुखद अंत कानपुर पुलिस की बड़ी नाकामी को दर्शाता है। ऐसे संजीदा मामलों में आलाधिकारियों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वो नेतृत्व करें। सिर्फ निर्देश देने से संजीत अपहरण कांड जैसे ही निराशाजनक परिणाम मिलते हैं।
जिले में एडीजी, आईजी और एसएसपी जैसे वरिष्ठ अधिकारियों के होते हुए इस कांड का निराशाजनक अंत पुलिस की घोर लापरवाही का परिणाम है। डीजीपी ने कहा कि 22 जुलाई को अपहरण होने के बाद जब थाना प्रभारी को 29 जुलाई को फिरौती मांगने की सूचना मिली थी, तो उसी वक्त इंस्पेक्टर को आलाधिकारियों से सामंजस्य बनाना चाहिए था।
इस मामले में संजीत के परिजनों ने एसएसपी से शिकायत की तब जाकर पुलिस ने अपहरण का मुकदमा दर्ज किया। मामले की जानकारी आलाधिकारी को उसी दिन हो गई थी फिर भी उन्होंने दोबारा घटना की हाल खबर नहीं ली, जो हीलाहवाली दर्शाती है। इसी का फायदा नीचे के कर्मचारियों ने उठाया। इंस्पेक्टर ने 30 लाख जैसी फिरौती सिपाहियों के भरोसे छोड़ दी।
जब स्वाट टीम और थाने की प्राइवेट टीम मौजूद थी तो पहले से जाल बिछाना चाहिए था। पूरा प्रकरण देखने के बाद तो उन्हें खुद इंस्पेक्टर रणजीत राय पर मिलीभगत का शक होने लगा है। आलाधिकारियों की नादानी भी देखने को मिली। गंभीर मामला होने के बाद भी उनका इस तरह से मुंह मोड़े रहना बेहद शर्मनाक रहा है।