सुप्रीम कोर्ट की अवमानना के दोषी वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को कोर्ट ने एक रुपये का जुर्माना लगाकर दंडित किया है। जुर्माने की यह राशि देश में चर्चा का विषय है। लगभग साठ साल पहले वरिष्ठ समाजवादी नेता डॉ. राममनोहर लोहिया पर भी कानपुर जिला न्यायालय द्वारा एक मामले में एक रुपये जुर्माना लगाए जाने का आदेश किया गया था।
वरिष्ठ अधिवक्ता कौशल किशोर शर्मा ने बताया कि वर्ष 1960 में डॉ. लोहिया सर्किट हाउस में रुकने की जिद पर अड़े थे। डॉ. लोहिया न तो मंत्री थे न ही किसी सरकारी पद पर थे। ऐसे में प्रशासन ने उन्हें सर्किट हाउस में रहने से रोका और विरोध पर गिरफ्तार कर लिया। मामला कोर्ट पहुंचा तो डॉ. लोहिया ने खुद ही मुकदमे की पैरवी की।
तर्क रखा कि देश आजाद हो चुका है और देश की सम्पत्ति उपभोग का अधिकार सिर्फ सत्ता पक्ष ही नहीं बल्कि विपक्ष के लोगों को भी है। इस मुकदमे के बाद ही सर्किट हाउस के दरवाजे सत्ता पक्ष के साथ-साथ विपक्ष के नेताओं के लिए भी खुल गए। कोर्ट ने डॉ. लोहिया का तर्क तो स्वीकार किया लेकिन कानून के उल्लंघन के लिए उन पर एक रुपये का जुर्माना भी लगाया था।
अधिवक्ता शर्मा ने बताया कि डॉ.लोहिया की जीवनी पर आधारित एक पुस्तक में इस वृतांत का जिक्र है। यह भी कहा गया है कि एक रुपये जुर्माने की वसूली संभव नहीं थी इसलिए इसे भी वसूल नहीं किया जा सका। डॉ. लोहिया ने एक रुपया जुर्माना अदा करने से यह कहते हुए इनकार कर दिया था कि एक रुपये का नोट भारत सरकार छापती है जबकि दो रुपये व उससे अधिक की करेंसी रिजर्व बैंक छापती है। एक रुपया भारत सरकार की निधि है जबकि उससे ऊपर की करेंसी देश की निधि है। सरकार की निधि की वसूली संभव नहीं है। अगर एक रुपये से अधिक जुर्माना लगाया जाता तो मैं अदा करता।