कोरोना महामारी में हर तरफ लूट मची है। शव को कंधा देने तक के लिए रुपये वसूले जा रहे हैं, ऐसे में शव वाहन चलाने वाले हिमांशु और दिलशाद कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी के साथ सेवा कार्य में लगे हैं। दोनों अपने मासिक वेतन से ही खुश हैं और किसी भी परिजन से एक रुपये भी अतिरिक्त नहीं लेते।
दोनों का मानना है कि इस आपदा में जरूरतमंदों की सेवा ही मेवा है। हिमांशु भगवान परशुराम महासभा की ओर से संचालित शव वाहन चलाते हैं। 22 अप्रैल से मई के दूसरे सप्ताह तक हर दिन दो से चार शवों को भैरोघाट, सिद्घनाथ घाट, बिठूर स्वर्गाश्रम, ड्योटी घाट और गंगाघाट शुक्लागंज पहुंचाया।
बर्रा-विश्वबैंक में रहने वाले हिमांशु को हर महीने 10 हजार सैलरी मिलती है। पिछले दो साल से शव वाहन चला रहे हैं। कहते हैं कोरोना संक्रमित परिवार पहले से ही अपना सब कुछ खो बैठते हैं। ऐसे में उनकी मजबूरी का फायदा उठाना गलत है।
महासभा के अध्यक्ष भूपेश अवस्थी और कोषाध्यक्ष श्याम नारायण शुक्ला ने बताया कि हिमांशु को जब भी लोग रुपये देते हैं, वह बड़े ही आदर भाव से मना कर देता है। इसी तरह कानपुर ग्रामीण उद्योग व्यापार मंडल की ओर से संचालित शव वाहन दिलशाद सिद्दीकी चलाते हैं।
किसी भी घाट पर जाने के लिए 1400 रुपये फिक्स हैं। इसी में डीजल, मेंटेनेंस और एक चक्कर के पांच सौ रुपये होते हैं। कल्याणपुर के साहब नगर में रहने वाले दिलशाद का कहना है कि दुख, मुसीबत किसी पर भी आ सकती है। इसका यह मतलब नही है कि उसका फायदा उठाया जाए। इस तरह के रुपये बहुत दिन नहीं चलते हैं और खुश भी नहीं रह सकते हैं। व्यापार मंडल के अध्यक्ष संदीप पांडेय का कहना है कि दिलशाद जो लोगों की मदद कर रहे हैं, वह अनमोल है।