कपड़ा, चमड़ा और पेंट उद्योगों से निकलने वाला जहरीला व डाईयुक्त अपशिष्ट जल अब गंगा समेत अन्य नदियों और भूजल को प्रदूषित नहीं कर सकेगा। हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी कानपुर के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग ने जलशोधन की एक नई और क्रांतिकारी जैविक तकनीक विकसित की है।
प्रो. ललित और डॉ. मोहित ने विकसित किया 'LM4' मॉडल
यह बहु-सूक्ष्मजीवी जैव प्रक्रिया मॉडल बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह के मार्गदर्शन में शोधकर्ता डॉ. मोहित निगम द्वारा विकसित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित यह तकनीक औद्योगिक रंगों से प्रदूषित पानी को साफ करने में पूरी तरह सक्षम पाई गई है।
एक बैक्टीरिया करेगा टुकड़े, तो दूसरा खा जाएगा जहर
इस मॉडल की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खासियत दो अलग-अलग सूक्ष्मजीवों का आपसी सहयोग है। प्रक्रिया के दौरान पहला बैक्टीरिया टॉक्सिक रासायनिक तत्वों को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करता है, जबकि दूसरा बैक्टीरिया उन छोटे टुकड़ों को खाकर पूरी तरह समाप्त कर देता है।
कम लागत और पर्यावरण अनुकूल जलशोधन का बनेगा आधार
प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह ने बताया कि यह शोध भविष्य में उद्योगों के लिए कम लागत वाली, पर्यावरण-अनुकूल और बड़े स्तर पर लागू की जा सकने वाली जल शोधन प्रणाली का मजबूत आधार बनेगी। इसे टेक्सटाइल, चमड़ा, कागज और केमिकल इंडस्ट्री में आसानी से स्थापित किया जा सकता है। इससे उद्योगों को महंगे केमिकल ट्रीटमेंट से मुक्ति मिलेगी और नदियों में जाने वाले विषैले पानी पर पूरी तरह लगाम लग सकेगी।