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कानपुर HBTU का कमाल: बैक्टीरिया अब फैक्टरी में ही खत्म करेंगे डाई का जहर, तैयार हुआ 'LM4' मॉडल

Fri, 24 Jul 2026 11:45 AM IST
प्रसून शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला,कानपुर

सार

Kanpur News: उद्योगों से निकलने वाला डाईयुक्त अपशिष्ट जल अब बिना शोधन के गंगा और अन्य नदियों में नहीं पहुंचेगा। हरकोर्ट बटलर प्राविधिक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने ऐसा जैविक मॉडल विकसित किया है, जिसमें बैक्टीरिया फैक्टरी के भीतर ही डाई के जहरीले रसायनों को खत्म कर देंगे।
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एचबीटीयू का एलएम-4 मॉडल - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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कपड़ा, चमड़ा और पेंट उद्योगों से निकलने वाला जहरीला व डाईयुक्त अपशिष्ट जल अब गंगा समेत अन्य नदियों और भूजल को प्रदूषित नहीं कर सकेगा। हरकोर्ट बटलर टेक्निकल यूनिवर्सिटी कानपुर के बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग ने जलशोधन की एक नई और क्रांतिकारी जैविक तकनीक विकसित की है।

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शोधकर्ताओं ने 'LM4' मॉडल (ललित–मोहित माइक्रोबियल म्यूचुअलिज्म मॉडल) तैयार किया है, जिसके माध्यम से फैक्टरियों के भीतर ही हानिकारक रसायनों और रंगों का शत-प्रतिशत जैविक विघटन किया जा सकेगा। फैक्टरी से बाहर निकलने वाले पानी में न तो डाई का खतरनाक रंग बचेगा और न ही इंसानी सेहत को नुकसान पहुंचाने वाले घातक रसायन।

प्रो. ललित और डॉ. मोहित ने विकसित किया 'LM4' मॉडल

यह बहु-सूक्ष्मजीवी जैव प्रक्रिया मॉडल बायोकेमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह के मार्गदर्शन में शोधकर्ता डॉ. मोहित निगम द्वारा विकसित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित यह तकनीक औद्योगिक रंगों से प्रदूषित पानी को साफ करने में पूरी तरह सक्षम पाई गई है।

इस शोध में दो विशेष बैक्टीरिया 'स्यूडोमोनास पुटिडा' और 'लाइसिनिबैसिलस स्फेरिकस' का संयुक्त प्रयोग कर एक बहु-सूक्ष्मजीवी प्रणाली तैयार की गई है। यह मॉडल औद्योगिक रंगों के 90 से 97 प्रतिशत तक अपघटन में सक्षम साबित हुआ है।

एक बैक्टीरिया करेगा टुकड़े, तो दूसरा खा जाएगा जहर

इस मॉडल की सबसे बड़ी वैज्ञानिक खासियत दो अलग-अलग सूक्ष्मजीवों का आपसी सहयोग है। प्रक्रिया के दौरान पहला बैक्टीरिया टॉक्सिक रासायनिक तत्वों को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करता है, जबकि दूसरा बैक्टीरिया उन छोटे टुकड़ों को खाकर पूरी तरह समाप्त कर देता है।

इस आपसी तालमेल से पानी से डाई का रंग और उसकी पूरी टॉक्सिसिटी खत्म हो जाती है। डाई के हानिकारक रसायनों से होने वाले कैंसर, त्वचा रोग और श्वसन संबंधी बीमारियों के खतरे को रोकने में यह तकनीक मील का पत्थर साबित होगी।
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कम लागत और पर्यावरण अनुकूल जलशोधन का बनेगा आधार

प्रोफेसर डॉ. ललित कुमार सिंह ने बताया कि यह शोध भविष्य में उद्योगों के लिए कम लागत वाली, पर्यावरण-अनुकूल और बड़े स्तर पर लागू की जा सकने वाली जल शोधन प्रणाली का मजबूत आधार बनेगी। इसे टेक्सटाइल, चमड़ा, कागज और केमिकल इंडस्ट्री में आसानी से स्थापित किया जा सकता है। इससे उद्योगों को महंगे केमिकल ट्रीटमेंट से मुक्ति मिलेगी और नदियों में जाने वाले विषैले पानी पर पूरी तरह लगाम लग सकेगी।

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