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बड़े औद्योगिक घराने से रिश्तेदारी के बाद "जितना चाहा, उतना कर्ज मिला"

Thu, 22 Feb 2018 02:00 PM IST
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
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विक्रम कोठारी
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कानपुरः देश के एक बड़े औद्योगिक घराने से रिश्तेदारी जुड़ने के बाद विक्रम कोठारी की धमक बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों में बढ़ गई थी। कोठारी के इसी रुतबे के आगे बैंकिंग व्यवस्थाएं और तमाम सारे नियम, कानून बौने साबित हुए। दस्तावेजी खामियों को नजरअंदाज करते हुए सात बड़े बैंकों ने उनके लिए अपना खजाना खोल दिया। 

अमर उजाला ने पड़ताल की तो सामने आया कि रुतबे और पैसे के आगे कोठारी ने जब और जितना चाहा, उतना कर्ज उन्हें मिला। बदले में संपत्तियों को बंधक रखने के नियम तार-तार किए गए। बताते हैं कि कोठारी को लोन देने वाले बैंकों के आला अफसरों को इस सेवा के बदले मेवा भी खूब मिली है। यही वजह रही कि कोठारी को दिए गए लोन के बदले 10 से 15 फीसदी कीमत वाली संपत्तियां ही बंधक रखी गईं। 
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बैंकिंग इंडस्ट्री के सूत्र बताते हैं कि बड़े उद्योगपतियों को जो भी लोन दिया जाता है उसमें बैंकों के सीएमडी और बोर्ड के निदेशक मंडल स्तर के अधिकारियों की सहमति होती है। उन्हीं के हस्ताक्षर से बैंकों का समूह (कंसोर्टियम) बनाकर लोन देने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। उद्योगपति को भले ही उसके शहर में उसकी पसंद की शाखा से लोन मिले लेकिन वहां के शाखा प्रबंधक की इच्छा और अनिच्छा मायने नहीं रखती। उद्योगपति विक्रम कोठारी मामले में भी ऐसा ही हुआ। कोठारी को जब भी अपने कर्ज की लिमिट बढ़वानी होती थी, मुख्यालय स्तर से आदेश आ जाता था। बताते हैं कि यहां कोठारी का रुतबा और सेवा के बदले मिली मेवा काम करती थी। 
 
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ऑडिटरों पर होता था प्रभाव का इस्तेमाल

विक्रम कोठारी
शाखा स्तर से कई बार किया गया सचेत 
बैंकों के सूत्र बताते हैं कि कोठारी के लोन की सीमा जब हद पार करती गई या उनकी किस्तें समय पर जमा न होने लगीं तो तत्कालीन शाखा प्रबंधकों और क्षेत्रीय प्रबंधकों ने मुख्यालयों को आगाह भी किया था। समय रहते इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। सीबीआई ने भी इसी बिंदु को अपनी जांच में प्रमुखता से शामिल किया है। इन्हीं कारणों से कोठारी को लोन देेने वाले बैंकों के उच्चाधिकारियों की जानकारी जुटाई जा रही है। माना जा रहा है कि कोठारी प्रकरण में एक बैंक अफसर की भी जल्द ही गिरफ्तारी हो सकती है। 

ऑडिटरों पर होता था प्रभाव का इस्तेमाल
कोठारी के प्रभाव का इस्तेमाल ब्रांच में ऑडिट करने आए ऑडिटरों पर भी किया जाता था। ऑडिटर लोन की खामियां बताते तो उन्हें समझाया जाता था कि यह फलां शख्स का एकाउंट है। किन्हीं कारणों से ऑडिटर यदि अपनी बात पर अड़ जाते थे तो उन्हें यहां तक चेताया जाता था कि बैंकों और कंपनियों में उन्हें काम मिलना मुश्किल हो जाएगा। इन्हीं खामियों के कारण कोठारी का लोन बढ़ता गया। बैंक के आंतरिक ऑडिट से लेकर रिजर्व बैंक के ऑडिट तक में ये गड़बड़ियां सामने नहीं आईं। सूत्र बताते हैं कि विक्रम कोठारी ने हर उस कुर्सी को बेहतर तरीके से मैनेज किया जहां से उन्हें नुकसान हो सकता था। 
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